• चैतन्य इकाई में आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति का प्रकाशन शरीर के द्वारा होता है जिसे प्रत्येक जीव शरीर के द्वारा आशा और मनुष्य शरीर के माध्यम से आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति को देखा जाता है। चैतन्य क्रिया अर्थात जीवन अक्षय शक्ति सम्पन्न होने के कारण उपभोग से अधिक उत्पादन करने में सक्षम है। इसी सक्षमतावश चैतन्य क्रिया या जीवन में आशा, विचार इच्छा, संकल्प एवं अनुभव शक्तियों का प्रकाशन कितना भी करें उससे चैतन्य क्रिया या जीवन में कोई छरण नहीं होता है। यह उसकी अक्षय शक्ति का प्रधान लक्षण है। चैतन्य इकाई या जीवन की अक्षय शक्ति सम्पन्नता के कारण जीवनीयता प्रतिष्ठित या प्रकाशित होती है। यही संवेदनशीलता तथा संज्ञानीयता है। इसी प्रतिष्ठावश वातावरणस्थ क्रिया व सत्यता के संकेत ग्रहण व प्रसारण की क्रिया होती है। इस प्रकार चैतन्य क्रिया ही जीवन है और अक्षयता ही इसकी प्रथान विशेषता है।
  • उपरोक्त विशेषतावश चैतन्य इकाई में गुणात्मक परिवर्तन के साथ मात्रात्मक परिवर्तन नहीं होता है। चैतन्य इकाई में गुणात्मक परिवर्तन के साथ यदि मात्रात्मक परिवर्तन होता तब प्रत्येक आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति के साथ मात्रात्मक एवं रूपात्मक परिवर्तन भी होता जबकि ऐसा नहीं होता है। इसके विपरीत विचारों के अनुरूप बिना किसी रूपात्मक या मात्रात्मक परिवर्तन के शरीर का संचालन होता रहता है। चैतन्य के सहयोग से जड़ शरीर जितनी शक्ति ग्रहण करता है उससे कहीं अधिक शक्ति को बहिर्गत करता है। चैतन्य क्रिया अथवा जीवन के अतिरिक्त स्थूल शरीर रासायनिक एवं भौतिक संरचना है। इसके सम्पूर्ण क्रियाकलाप यांत्रिक हैं। यांत्रिकता में जितनी शक्ति ग्रहण होती है उससे कम का प्रकरन होता है। इन तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य जड़ शरीर और चैतन्य क्रिया (जीवन) का संयुक्त साकार रुप है। मानव के संस्कार मात्र का जीवनगत होना अर्थात आशा, विचार, इच्छा, एवं संकल्प गत होना उसी के आनुषंगिक क्रान्तिकारिता (गुणात्मक विकास) एवं जनवादिता का होना एक वस्तुगत सत्य के रुप में पाया जाता है जिसके आधार पर विकास एवं ह्रास स्पष्ट होता है। मनुष्य का प्रकाशन अमानवीयता, मानवीयता और अतिमानवीयता वादी कार्य, व्यवहार, व्यवसाय, अध्ययन एवं व्यवस्था संबंधी प्रक्रियाओं के रुप में होता है। मनुष्य की स्वभाव गति मानवीय होने के कारण उसकी तुलना में ह्रास एवं विकास का निर्णय हो पाता है।
  • नियतिक्रम में विकास का अभाव नहीं है। यह प्रकृति में विधिवता के रुप में दृष्टव्य है। यह विकास विविधता इस पृथ्वी पर चार स्थितियों में अर्थात पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था एवं ज्ञानावस्था में परिलक्षित होती है। यही वैविध्यता विकास क्रम प्रक्रिया एवं व्यवस्था को स्पष्ट करती है। इन सब का अध्ययन ही दार्शनिकता है।
  • दार्शनिकता मनुष्य की संवेदनशीलता एवं संज्ञानीयता का अध्ययन एवं प्रकाशन है। यह मनुष्य की अविभाज्य क्षमता है। दर्शनक्षता अस्तित्व में, अस्तित्व से एवं अस्तित्व के लिये समाधान एवं आनन्द के अर्थ में चरितार्थ होती है। अस्तित्व समग्र सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति है। प्रकृति का तात्पर्य रुपात्मक अस्तित्व से है। यही अनेक रुप में स्पष्ट है। अनेकरूपता अथवा वैविध्यता मूलतः अध्ययन का विषय है।
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