- अरुपात्मक अस्तित्व समान रुप में अर्थात सर्वत्र एक सा होना पाया जाता है। सम्पूर्ण गति एवं मात्रा रुपात्मक अस्तित्व की सीमा में दृष्टव्य है। सम्पूर्ण गति व मात्रा अरुपात्मक अस्तित्व में समाहित है। प्रकृति की वृहद से वृहद एवं सूक्ष्म से सूक्ष्म इकाइयाँ गति व मात्रा रहित अस्तित्व में घिरी हुई हैं जो मध्यस्थ सत्ता, शून्य, ज्ञान, पूर्ण एवं परमात्मा आदि संज्ञा से अभिहित है। मूलतः रुपात्मक एवं अरुपात्मक अस्तित्व ही अस्तित्व समग्र है।
- अस्तित्व स्वयं में कोई संख्या नहीं है। यह केवल अनंत एवं व्यापक है। कारण गुण एवं गणित से मनुष्य के द्वारा प्रत्येक स्थिति निर्णित होती है जबकि अस्तित्व के संबंध में उसकी विस्तार व्याप्ति सीमाएँ संख्या ग्राहृय न होने के कारण इसे केवल व्यापक एवं अनंत की संज्ञा दी गई है। अस्तित्व कैसा है? यह स्पष्ट होता है। कितना है? यह स्पष्ट नहीं होता। इसका मूल कारण यह है कि मनुष्य में अस्तित्व सर्वस्व की आवश्यकता सिद्ध नहीं हो पाती है। फलतः उसके लिये प्रयास नहीं होता है. साथ ही मनुष्य के लिये अनुभव से अधिक उदय होता है। अर्थात् अनुभव के आधार पर अधिक का अनुमान होता है। मनुष्य में, मनुष्य से एवं मनुष्य के लिये अनुभव ही प्रमाण परम है। प्रयोग व व्यवहार के मूल में भी अनुभव ही है।
- रुपात्मक अस्तित्व अनेक इकाइयों का समूह है। प्रत्येक इकाई का विभिन्न स्तरीय विकास अपेक्षाकृत अस्तित्व है। यही स्पष्टतः संख्या एवं संख्या का आधार है। विकास के क्रम में मनुष्य का अस्तित्व भी एक घटना है। प्रत्येक घटना में अपनी विशेषताएं होती हैं। इसी तारतम्य में मनुष्य में अपनी विशेषता के अनुसार अर्थात ज्ञानावस्था के विकास के अनुरुप पूर्णतया दर्शनक्षमता की संभावना है। इसी के आधार पर अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा का अधिकार मानव में, मानव से, एवं मानव के लिये सुरक्षित है। संभावनाओं को सफल बनाना ही अधिकार है।
मानवीयता मनुष्य की स्वभावगति है। स्वभावगति में उसके गुणात्मक परिवर्तन का अधिकार व निरन्तरता स्पष्ट होती है। अग्रिम विकास तब तक होता रहता है जब तक मनुष्य इकाई को सत्ता में अनुभव न हो जाय। यही विकासपूर्णता है। यही समाधान एवं समाधान ही निरन्तरता है। स्वभावगति में हस्तक्षेप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य उत्पन्न होता है, जो आवेशित गति है। आवेशित गति को सामान्य बनाने के लिये वातावरण का दबाव ही अनुशासन, सामान्य गति को बनाये रखना ही शासन एवं उसकी निरन्तरता ही प्रभुसत्ता अथवा प्रबुद्धतापूर्ण सत्ता है। यही निपुणता, कुशलता एवं पांडित्यपूर्ण संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था है। पांडित्य स्वयं में विधि है जिसके आधार पर नीति, कार्य पद्धति एवं विषय वस्तु का निर्धारण एवं निस्सरण होता है। न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य का ज्ञान ही पांडित्य है। पांडित्य मनुष्य के कार्य व्यवहार, आचरण, अभ्यास एवं विकास का मूल स्त्रोत एवं लक्ष्य है। कुशलता एवं निपुर्णता, शिष्टता एवं व्यवसाय के आधार एवं समृद्धि के लक्ष्य है। पांडित्य के अभाव में कुशलता एवं निपुणता की उपयोगिता का ध्रुवीकरण नहीं हो पाता है। निपुणता एवं कुशलता का अधिकार उपयोगिता एवं सुन्दरता मूल्य की सीमा में उपादेयी होता है। पांडित्य में जीवन मूल्य अथवा स्थापित मूल्यानुभव या प्रमाण क्षमता या अधिकार है। प्रमाणिकता स्वतः सुख, शांति, सन्तोष एवं आनन्द है। यही मन, वृति, चित्त, बुद्धि एवं आत्मा के संबंध में निर्विषमता है। प्रमाणिकता मनुष्य का अधिकार परम है। मानवीयता पूर्ण पद्धति से आचरण व व्यवहार करने