मानव अपने-अपने ढंग से प्रयास करता ही रहा, कोई न कोई पंथ, मत, संप्रदाय, जाति भाषा, अपनी श्रेष्ठतानुसार किसी न किसी परम्परा को अपनाये और एक दूसरे के साथ टकराने की जगह में आ गये। टकराने की जगह में रहा विज्ञान, ये इसी को घटा दिया। सभी अपनी-अपनी जगह जीते रहे, शांति पूर्वक भी अशान्ति पूर्वक भी। एक समुदाय दूसरे समुदाय से जब-जब मिला है या संबंध स्थापित करने गया है तो टकराहट ही मिली है। ये सब घटनायें किसी न किसी रूप में इतिहास में प्रकारान्तर से रखा ही है। इसके बाद जब हम दूसरी विधि से पहुँचे तो वस्तु को बीच में लाये, जिसे विज्ञान युग कहा जा सकता है। जिसमें वस्तु को बीच में रख कर मनुष्य को चारों ओर घुमाया गया।
हम आवश्यकता से सुविधा, सुविधा से भोग, भोग से अति-भोग व बहु-भोग की ओर चल दिये। यह भी सर्वविदित है कि भोग, अति-भोग व बहु-भोग व्यक्तिवादी होते हैं। यह समाज हो नहीं सकता, न समुदाय हो सकता है जब समुदाय ही नहीं तो समाज कहाँ से होगा। ये सारी बातें स्पष्ट रूप में व प्रमाण रूप में सम्मुख रखा हुआ है ही।
अब इन दोनों को मिलाकर या किसी एक को सर्वाधिक ले कर शिक्षा में सम्मिलित कर लिया। अभी शिक्षा में जो सर्वाधिक सम्मिलित है वह है वस्तु केंद्रित ज्ञान। ईश्वर केन्द्रित ज्ञान बहुत न्यूनतम हो चुका है। इस अवस्था में आकर मनुष्य दिग्भ्रमित, दिशाहीन एवं अनिश्चयता से कुंठित पाया जा रहा है।
इन सबको देखने के बाद मैं जो लाया वह है अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान- इसके अनुसार जीवन अपने आप में स्पष्ट होती है। जीवन जब स्पष्ट हो सकता है तो मनुष्य, जीव, वनस्पति व खनिज भी स्पष्ट हो ही सकता है। खनिज संसार की अपनी ही प्रतिष्ठा है। खनिज और वनस्पति एक आवर्तनशील पद्धति से अपने को वैभवित किये हुये हैं। इसी भांति मनुष्य का अन्य प्रकृति के साथ आवर्तनशील पद्धति वैभवित होना एक सहज क्रिया है।
इस ढंग से मनुष्य जीवन और शरीर का संयुक्त साकार रूप में इस धरती पर वैभवित हुआ।
वर्तमान की शिक्षा में शरीर को ही अध्ययन करने का प्रयास किया है फलस्वरूप मनुष्य शरीर को जीवन समझने लगा, शरीर को जीवन समझने से पराभव ही हाथ आया। जीवन क्या है? स्पष्ट करने को ही जीवन-विद्या कहा गया है।
- रहस्य मूलक ईश्वर केन्द्रित चिंतन ज्ञान
- अनिश्चयता व अस्थिरता वस्तु केन्द्रित चिंतन ज्ञान
अस्तित्वमूलक मानव-केन्द्रित चिंतन ज्ञान मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद इसमें से निःसृत जीवन ज्ञान सहज रुप में मिलता है।
रहस्यमूलक ईश्वर-केन्द्रित ज्ञान और अनिश्चितता अस्थिरतामूलक वस्तु-केन्द्रित चिंतन ज्ञान शिक्षा और व्यवस्था का आधार नहीं हो सकता। इन दोनों को मिलाकर, घटाकर, काटकर या जोड़कर शिक्षा और व्यवस्था का आधार नहीं बनाया जा सकता। किसी गति को आगे बढ़ाना है तो पीछे की गति को ध्यान में रखना ही पड़ेगा, अन्यथा आगे की गति नहीं हो पाती।