जीवन अपने स्वरूप में प्रत्येक मानव में समान रूप में कार्यरत है और होने की संभावना से परिपूर्ण है। इसे इस प्रकार देखा गया है कि जीवन रचना सम्पूर्ण जीवन में समान है। जीवन शक्तियाँ अक्षय रूप में हर जीवन में समान है। जीवन लक्ष्य प्रत्येक जीवन का समान है। जीवन सहज कार्यकलाप प्रत्येक जीवन में समान है। इन सभी वैभवों का प्रमाण मानव ही है। जागृत मानव में जीवन सहज लक्ष्य सार्थक होने के लिये चिन्हित मार्ग स्पष्ट रहना, यही चिन्हित मार्ग को अर्थात् जीवन जागृति को परंपरा के रूप में अर्थात् धारक-वाहकता पूर्वक पीढ़ी से पीढ़ी सहज सुलभ करना-कराना और करने के लिये मत देना मानव सहज पुरूषार्थ परमार्थ का तात्पर्य है। जिसका साक्ष्य समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व है। जिसका व्यवहार रूप अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी है।
मानव परंपरा में जीवन जागृति का प्रमाण व्यवहार में ही सुलभ होना पाया गया है। फलस्वरूप परंपरा में जागृति का प्रभाव वैभवित रहना सहज है। यह सर्वमानव सहज अपेक्षा, आवश्यकता है। जागृत मानव ही जागृति परंपरा को अनुप्राणित करने में समर्थ और सार्थक हो पाता है और जागृत मानव परंपरा में मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार सम्पन्न हर व्यक्ति स्वायत्त होना और ऐसे स्वायत्त मानव ही परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होना स्पष्ट हो चुका है। परिवार मानव अपने में समाधान समृद्धि सम्पन्न होना भी स्पष्ट हुआ है। इस आशय की स्वीकृति सर्वमानव में होना पाया जाता है। ऐसा परिवार अर्थात् मानवीयतापूर्ण परिवार में हर स्वायत्त मानव संबंधों को पहचानते हैं, मूल्यों का निर्वाह करते हैं, उभय तृप्ति पाते हैं। संबंधों को सामान्य रूप में संबोधन सहज परंपरा, प्रत्येक भाषा में प्रकारान्तर से स्पष्ट हुई है। पहले से यह बात भी स्पष्ट हुई है कि प्रत्येक संबंध का आशय फलस्वरूप में उसका वैभव भी अभिहित हुआ है।
संबंध की परिभाषा अपने स्वरूप में पूर्णता के अर्थ में अनुबंध है। पूर्णता का अर्थ क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता ही है। क्योंकि अस्तित्व में तीन चरणों में पूर्णता और उसकी निरंतरता का होना देखा गया है। यह गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता और उसकी निरंतरता है। गठनपूर्णता के अनन्तर जीवन और उसकी निरंतरता, क्रियापूर्णता के अनन्तर समाज और उसकी निरन्तरता और आचरण पूर्णता के अनन्तर प्रामाणिकता और उसकी निरंतरता होती है। इसे भली प्रकार से अस्तित्व में समझा गया है। इन्हीं मूल ध्रुवों के आधार पर “व्यवहारवादी समाजशास्त्र” प्रस्तुत हुआ है। अनुबंध का तात्पर्य अनुक्रम से प्रतिबद्धित स्थिरता निश्चयता रहने से है। प्रतिबद्धता का