तात्पर्य निष्ठा केन्द्र। निष्ठा का तात्पर्य हर विधाओं में न्यायपूर्ण व्यवहार, नियमपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने से है।

मानव सहज सभी संबंध पूर्णता को प्रतिपादित करने के लिये अनुबंधित रहने के कारण ही है। हर संबंधों का पहचान के साथ ही मूल्यों का उद्गमन जीवन सहज रूप में व्यक्त होता है। इसका मूल स्रोत जीवन अक्षय शक्ति, अक्षय बल सम्पन्न रहना ही है। यह भी हम समझ चुके हैं कि जीवन ही शरीर को जीवन्त बनाए रखता है और जीवन अपने आशयों को शरीर के द्वारा मानव परंपरा में, से, के लिये अर्पित करता है। पहला समझदारी को प्रमाणों के रूप में अर्पित करता है और प्रबोधनों के रूप में अर्पित करता है। प्रबोधन किसी को बोध के लिए अर्पित होता है और प्रमाण स्वतृप्ति और तृप्तिपूर्ण परंपरा के आशय में घटित होती है। यह जीवन जागृति की स्वाभाविक क्रिया है। जागृत मानव ही व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण होना पाया जाता है। व्यवस्था स्वयं में न्याय, उत्पादन और विनिमय सुलभता ही है। इन्हीं की निरन्तरता के लिये स्वास्थ्य-संयम और मानवीय शिक्षा-संस्कार एक अनिवार्य स्थिति है। इस प्रकार व्यवस्था का पाँच आयाम होता है। इन्हीं आयामों में भागीदारी, व्यवस्था में भागीदारी का तात्पर्य है। इस प्रकार हर जागृत मानव (परिवार मानव) सहज रूप में व्यवस्था को प्रमाणित करता है। यही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का आधार और अभिव्यक्ति है।

संबंधों को मानव के सम्पूर्ण कार्य-व्यवहार के आधार पर संबोधन रूप में पहचाना जाता है। जिसकी सूची पहले प्रस्तुत किया गया है। हर संबंधों का प्रयोजन भी उसी के साथ स्पष्ट है।

मानव संबंधों का प्रकार

  • माता - पुत्र - पुत्री
  • पिता - पुत्र - पुत्री
  • भाई - बहिन
  • मित्र - मित्र
  • गुरू - शिष्य
  • पति - पत्नी
  • स्वामी (साथी) - सेवक (सहयोगी)

व्यवस्था संबंध (व्यवस्था - कार्यप्रणाली)

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