हर संबंधों में पूरकता प्रधान ज्ञान प्रणाली व्यवस्था के रूप में कार्यप्रणाली गति के रूप में सहअस्तित्व सहज रूप में ही स्पष्ट होता है। हर संबंध एक-दूसरे के पूरक होने के अर्थ में नित्य प्रतिपादन है। अस्तित्व सहज व्यवस्था क्रम में पूरकता विधि प्रभावशील है। इसके मूल में अस्तित्व सहज सहअस्तित्व ही है।

हर संबोधन में अपेक्षाएँ समाहित रहना पाया जाता है। हर संबंधों के संबोधन प्रक्रिया में जागृति की अपेक्षा रहता ही है। उसके साथ तीन संबंध ही देखने को मिला। ये तीन संबंध मानव संबंध, नैसर्गिक संबंध, और व्यवस्था संबंध हैं। मानव संबंध में अपेक्षाएं शरीर पोषण, संरक्षण, समाजगति की अपेक्षाएँ प्रकारान्तर से समायी रहती है। पोषणापेक्षा - पोषण प्रवृत्तियाँ तन, मन (जीवन) और धन के संबंधों में अथवा तन, मन (जीवन) और धन रूपी तथ्यों का पोषण, संरक्षण अपेक्षा और प्रवृत्ति मानव सहज गति होना पाया जाता है। यथा -

  • जागृत मानव अन्य की जागृति के लिये प्रवृत्त रहता है।
  • स्वस्थ मानव अन्य के स्वस्थता के लिए प्रयत्नशील रहता है।
  • समृद्धिशील मानव अन्य के समृद्धि सम्पन्नता में सहायक होने के लिये प्रवृत्तशील रहता है।
  • न्याय प्रदायी क्षमता सम्पन्न मानव, अन्य को न्याय सुलभ होने के लिये प्रवृत्तिशील रहता है।
  • किसी उत्पादन-कार्य में पारंगत मानव अन्य को पारंगत बनाने के लिये प्रवृत्तिशील रहता है।
  • मानव स्वयं व्यवस्था में जीता हुआ समग्र व्यवस्था में भागीदारी करते हुए अन्य को व्यवस्था में भागीदारी के लिये प्रेरित करने में प्रवृत्तिशील रहता है।

इस विधि से हर प्रौढ़-पारंगत, स्वायत्त मानव अपने अर्हता के प्राप्तियों को स्थापित करने में प्रवृत्तिशील रहता है। मानव अपने परंपरा बनाने में प्रवृत्तिशील है चाहे यह अमानवीयता के सीमा में हो या मानवीयता-अतिमानवीयता के रूप में क्यों न हो?

मानवीयता और अतिमानवीयतापूर्ण ज्ञान, विवेक, दर्शन, विज्ञान पूर्वक हर व्यक्ति अपने को अभिव्यक्त, संप्रेषित और प्रकाशित करते हुए देखने को मिलता है। इसी आधार पर अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का उदय होता है। यह व्यवहारवादी समाजशास्त्र अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था को प्रतिपादित करता है और संतुष्ट है।

अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में, से, के लिये जागृति ही प्रधान आधार है। जागृति केवल मानव में ही होना पाया जाता है। इसलिये मानव में ही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था की

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