संभावना बनी हुई है। दूसरे विधि से हर मानव स्व-जागृति को वरता ही है। अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था की अपेक्षा करता ही है। यही ज्ञानावस्था सहज मौलिक अपेक्षा है। जागृति जीवन सहज अधिकार है। यही जीवन क्षमता के रूप में विद्यमान रहता है। यही योग्यता पात्रता के रूप में अभिव्यक्त, संप्रेषित और प्रकाशित होते हैं। इसी विधि से कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित भेदों से सम्पूर्ण मानव संबंध बनाम समाज संबंध, दूसरा व्यवस्था संबंध, तीसरा नैसर्गिक संबंधों को जानते, मानते, पहचानते और निर्वाह करते हैं।
परिवार संबंध, मानव संबंध, समाज संबंध ये सब आवश्यकतानुसार उपयोग करने का नाम है। सबका निर्देशित अर्थ, चिन्हित अर्थ अखण्ड समाज ही है। अखण्ड समाज का पहचान, लक्ष्य, प्रयोजन, प्रणाली, पद्धति, नीतियों के समानता से है। मानव लक्ष्य समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व होना ही है। प्रयोजन व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी है। मानवीयतापूर्ण पद्धति न्याय, उत्पादन, विनिमय, स्वास्थ्य-संयम और शिक्षा-संस्कार में पूरकता प्रणाली परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था प्रणाली और नीति तन, मन, धन रूपी अर्थ के सुरक्षा हैं, यही मानव का मौलिक अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन है। अस्तित्व नित्य प्रकाशमान होने के कारण अस्तित्व में हर वस्तु का प्रकाशित रहना स्वाभाविक है। सम्पूर्ण अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन अस्तित्व सहज ही है। अस्तित्व स्वयं ही नित्य अभिव्यक्ति व संप्रेषणा है। मानव अस्तित्व में अविभाज्य वर्तमान व अभिव्यक्ति है। सभी अभिव्यक्तियाँ सभी अवस्थाओं में अभ्युदय के अर्थ में ही व्यक्त हैं। इस प्रकार अस्तित्व स्वयं में ही प्रकाशित, अभिव्यक्त व सम्प्रेषित है। इस क्रम में यह समझ में आता है कि अस्तित्व निरंतर स्पष्ट व प्रकाशमान है। अस्तित्व ही नित्य संप्रेषणा है जो नित्य समाधान नित्य व्यवस्था है। अस्तित्व ही नित्य व्यक्त अभिव्यक्त है क्योंकि अस्तित्व सदा-सदा स्थिर, शाश्वत है, नित्य वैभव है। इन्हीं तथ्यों से यह भी ज्ञात होता है कि अस्तित्व में, से, के लिये कोई रहस्य व कोई अवरोध एवं संघर्ष नहीं है। विरोध नहीं है, विद्रोह नहीं है, विपन्नता नहीं है। बड़े-छोटे के रूप में कुंठा निराशा नहीं है। युद्ध व शोषण नहीं है। ये सभी नकारात्मक पक्ष मानव के द्वारा अपनाया हुआ भ्रमित परंपरा का देन है।
जागृत परंपरा में मानव ही सम्पूर्ण आयाम, कोण, दिशा व परिप्रेक्ष्य सर्व-देशकाल में जागृत शिक्षा यथा अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन रूपी जीवन ज्ञान सहज परम ज्ञान, अस्तित्व दर्शन सहज सहअस्तित्व रूपी परम दर्शन, मानवीयतापूर्ण आचण रूपी परम आचरण, ज्ञान-विज्ञान-विवेक सम्मत समाधानपूर्ण शिक्षा-संस्कार सुलभ होता है। जागृति सहज मानवीयतापूर्ण आचरण