स्वायत्त मानव के रूप में परिणित और परिवार में प्रमाणित हो जाता है। इसलिये परिवार में स्वायत्तता का अनुभव सहज हो जाता है।

जागृत मानव परंपरा में हर अभिभावक स्वायत्त रहता ही है। ऐसा जागृत अभिभावक अपने संतान में जागृति को अथवा जागृति सहज कार्य-व्यवहार को प्रमाणित करता हुआ देखना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है। यही परम संगीतमय कार्यक्रम का आधार होता है और सर्वशुभ कार्यों में भागीदारी निर्वाह करने में सहज होता है। इसी क्रम में शरीर पोषण-संरक्षण का फलन समाज गति रूप में अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करने में सहज होता है।

शिक्षा ही संस्कार रूप में जब प्रतिष्ठित होता है उसी मुहूर्त से जीवन जागृत होना स्वाभाविक होता है। जागृति पूर्ण मानव परिवार का वातावरण पाकर प्रमाणित होने की आवश्यकता-संभावना बलवती होती है। यही समाज गति का मूलसूत्र है।

संबंधों का पहचान सदा-सदा ही अनुभव महिमा और गरिमा होना पाया जाता है। महिमा का तात्पर्य स्वीकृत और अपेक्षित लक्ष्य की ओर गति और लक्ष्य प्राप्ति के रूप में होना देखा गया है। सर्वशुभ ही मानव परंपरा में, से, के लिये समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व ही है। यही जीवन जागृति है। जीवन में, से, के लिये सुख, शांति, संतोष, आनन्द है। सुख, शान्ति, संतोष, आनन्द यह जीवन सहज शक्तियों और बलों में पूरकता का ही फलन है। सर्वशुभ का प्रमाण जागृत जीवन शक्ति और बलों की सम्मिलित अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन है। इस विधि से हर परिवार मानव अपने सफलता और समग्र मानव के सफलता को मूल्यांकित कर पाता है। यही गरिमा का तात्पर्य है।

हर जागृत, स्वायत्त परिवार मानव ही अभिभावक के रूप में होना स्वाभाविक है अथवा माता-पिता के रूप में होना स्वाभाविक है। ऐसे अभिभावकों में उदारता और दयापूर्ण कार्य-व्यवहार स्वाभाविक रूप में बना रहता है। मानव अपने स्वायत्तता के साथ ही ऐसी अर्हता से सम्पन्न हुआ रहता है। परिवार में समाधान और समृद्धि वैभव के रूप में रहता ही है। ऐसा वैभव हर परिवार में मानवीयतापूर्ण पद्धति, प्रणाली, नीति से सर्वसुलभ हो जाता है। इस क्रम और विधि से मानव परंपरा में कोई विपन्नता का कारण शेष नहीं रह जाता। परिवार मानव के स्वरूप में यह वैभव सदा-सदा प्रमाणित रहता ही है। न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता हर परिवार मानव का प्रमाण अथवा अभिव्यक्ति है। समृद्धि, समाधान के योगफल में ही मानव परंपरा का वैभव प्रमाणित होता है। इससे कम में सम्भावना ही नहीं, इससे अधिक की आवश्यकता ही नहीं। समाधान-समृद्धि

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