• श्रम मूल्य के आधार पर विनिमय-कोष कार्यक्रम परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था का अंगभूत होना; जीवन जागृति पूर्ण विधि का ही अभिव्यक्ति है।
  • जीवन जागृति पूर्वक ही श्रम मूल्य का मूल्यांकन हर उत्पादित वस्तुओं का उपयोगिता, कला मूल्य के आधार पर निर्धारित होता है।
  • श्रम नियोजन श्रम विनिमय प्रणाली में प्रतीक वस्तुओं या मूल्यों का दखलांदाजी बनाम हस्तक्षेप नहीं होती। दूसरे विधि से इसकी आवश्यकता ही शून्य हो जाती है।
  • प्रतीक मुद्रा में भ्रमित मानव का कल्पना भ्रमपूर्वक किया गया सभी निर्णय स्थिर नहीं हो पाते इसीलिये प्रतीक मुद्रा और वस्तु का मूल्य ही अस्थिर हो जाता है।
  • प्रतीक मुद्रा के साथ ही अमानवीयता वश द्रोह-विद्रोह, शोषण, तस्करी की घटनाएं हो पाती हैं। प्रतीक वस्तु कोई धातु होना देखा गया प्रतीक मुद्रा, धातु मुद्रा और पत्र मुद्रा के रूप में देखा गया। यह दोनों प्रकार की मुद्रा प्रणाली में स्थिरता निश्चयता सिद्ध नहीं हो पाती इन सब कारणों से मानव कल्पित होना स्पष्ट हो जाता है।

जागृति पूर्वक ही मानव अस्तित्व सहज सहअस्तित्वपूर्ण पद्धति, प्रणाली नीतिपूर्वक नियति सहज प्रमाण होना देखा जाता है। हर मानव में श्रम शक्तियाँ जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में नियोजित होना देखा जाता है। संपूर्ण उत्पादन का उद्देश्य महत्वाकांक्षा, सामान्य आकांक्षा की वस्तुओं के स्वरूप में देखा जाता है। उत्पादित हर वस्तु आदिकाल से अभी तक समान रूप में उपयोगी होना पाया जाता है। जैसा आहार वस्तुएं आदिकाल से अभी तक क्षुधानिवृत्ति के उपयोग में प्रयोजित होना प्रमाणित है। आवासीय वस्तुएं आदिकाल से शरीर संरक्षण के अर्थ में उपयोगी रहा है। अभी भी उतना वैसा ही उपयोगी होना देखने को मिलता है। अलंकार वस्तुएं आदिकाल से जैसा शरीर संरक्षण और प्रसाधनों के प्रयोजन में प्रयोजित होता रहा है वैसे आज भी उपयोगी होना देखा जाता है। और आगे जबसे दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन संबंधी वस्तुएं और उपकरणों को उत्पादन कर पाया है इसका उपयोग कान, आँख, पैर के गतियों को सर्वाधिक बढ़ाया हुआ दिखाई पड़ता है। दूरगमन के लिये सर्वप्रथम पैर को उपयोग किया दो पैर वाला आदमी जितना जल्दी चल सकता है, जितना धीरे चलता है आंकलन किया। इसी प्रकार कान से दूर-दूर तक सुनने और आँख से देखने की इच्छा रहा। इन्हीं कारणों से मानव का सतत प्रयास सहअस्तित्व सहज संयोजन कुशलता निपुणता वश इन तीनों विधा में गति आवश्यकीय गति अथवा सर्वाधिक गति संपन्न यंत्र प्रणालियों को मानव ने प्राप्त कर लिया है।

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