संबंधी विशेषकर संपूर्ण उत्पादन का कार्य स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। मूल्यांकन कार्य में ये देखा गया है कि -
स्वायत्त मानव बनाम निपुणता, कुशलता, पांडित्य संपन्न मानव + प्राकृतिक ऐश्वर्य बनाम नैसर्गिकता + हस्तलाघव + मानसिकता का संयुक्त रूप में संपूर्ण उत्पादन मानव में, से, के लिये होना देखा गया है। हस्तलाघव का तात्पर्य सभी (पाँचो) ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय से निपुणता, कुशलता, पांडित्य रूपी कार्य करने से है। ज्ञानेन्द्रिय का तात्पर्य शब्दों को सार्थक निरर्थक रूप में विभाजित करने की क्रिया, सुनने; स्पर्श से कठोरता और मृदुलता को स्वीकारने की क्रिया; घ्राणेन्द्रियों से सुगन्ध और दुर्गन्ध को विभाजित करने की क्रिया; रूपेन्द्रियों से सुरूप, कुरूप की विभाजन क्रिया; रसेन्द्रियों से खट्टा, मीठा, चरचरा, खारा, कसैला और तीखा इन रूचियों को विभाजित करने की क्रिया। कर्मेन्द्रियों का तात्पर्य हाथ, पैर, मल-मूत्र द्वार और मुँह ये सब कर्मेन्द्रियों में गण्य होना पाया जाता है। हस्तलाघव क्रिया में निपुणता, कुशलता पूर्ण पांडित्य से संचालित पूरे शरीर के संपूर्ण अंग-अवयव सहित हाथ-पैर सटीक काम करने से बाकी सभी ज्ञानेन्द्रियों का संयोग कर्मेन्द्रियों के साथ संयोजित रहता ही है। इस विधि से हर व्यक्ति से श्रम प्राकृतिक ऐश्वर्य पर स्थापित होना देखा जाता है। इसमें यह भी देखा गया है - उत्पादन में भागीदारी, व्यवहार में मूल्यों का निर्वाह पूर्वक सामाजिक होने के लिए उपयोगिता-पूरकता प्रमाण है। दूसरी भाषा में - उत्पादन में भागीदारी, व्यवहार में सामाजिक होने का संतुलन तत्व और व्यवहार में सामाजिकता, व्यवसाय में स्वावलंबी होने का संतुलन तत्व इस प्रकार समाजिकता-स्वावलंबन पूरक होने का स्वरूप प्रमाणित होता है। ऐसे संतुलन कार्य में प्रवृत, रत, निष्ठान्वित रहना ही कायिक वाचिक, मानसिक, कृत, कारित अनुमोदित, जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में क्रियारत रहने का सार्थकता है। यही अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का आधार सूत्र और बीज रूप है। व्यवहार क्रम में उत्पादन का सार्थकता अर्थात् प्रयोजन प्रमाणित होता है। इस विधि से व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबन और इनमें परस्पर पूरकता अग्रिम उन्नति और विकास के लिये सीढ़ी दर सीढ़ी प्रमाणित होना मानव के लिए एक आवश्यकता, समीचीनता और सहजता है। सूत्र का तात्पर्य जागृति सहज नियम-नियंत्रण विधि से अधिकारिक रूप में दिखने वाला न्याय और नियम का संयोजन और उसकी निरंतरता से है। बीज रूप का तात्पर्य समाधानकारी सूत्र सम्मत कार्य प्रणाली और व्यवहार प्रणाली से है। यही सार्वभौम व्यवस्था और अखण्ड समाज को गति प्रदायी तत्व होना देखा गया है। इस प्रकार अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी हर मानव का मौलिक अधिकार होना पाया जाता है। मौलिक अधिकार का तात्पर्य