द्योतक है। यही समुदाय विधा में युद्ध, द्रोह, विद्रोह, शोषण मानसिकता है। मानव संचेतनावादी मानसिकता में न्याय, धर्म, सत्य ही विचारों का आधार हो पाता है। इसीलिये समाधान, समृद्धि, वर्तमान में विश्वास (अभय) और सहअस्तित्व में प्रामाणिकता के रूप में हर जागृत व्यक्ति स्वयंस्फूर्त विधि से संपन्न होता है। इससे पता लगता है हर मानव बहुआयामी होने के कारण जागृति पूर्वक ही सभी आयाम, कोणों में मानवत्व को प्रमाणित करना बना रहना यही समाज और समाजशास्त्र का प्रधान आशय है।

समाजशास्त्र मानव सहज मानवीयतापूर्ण विचारों का अध्ययन है, हर देशकाल स्थितियों में मानव का आचरण विचारों से अनुबंधित रहता ही है अथवा विचारों से जुड़ा ही रहता है। जागृति पूर्ण विचार सहित जितने भी आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्यों में मानव प्रस्तुत होता है वह कायिक, वाचिक, मानसिक रूप में होना पाया जाता है। ऐसे आचरणों को जागृति पूर्वक विधि से संपन्न किये जाने का मूल्यांकन स्वाभाविक रूप में होता है। इस क्रम में हर मानव का स्वयं का मूल्यांकन सहज हो जाता है। स्वयं का मूल्यांकन स्वयं में विश्वास पर आधारित रहना देखा गया है। स्वयं पर विश्वास अथवा स्वयं में, से, के लिये विश्वास का आधार जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण पूर्वक संभव हो जाता है।

सर्वशुभ समझदारी से ही है।

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