समग्र व्यवस्था में भागीदारी के लिए तत्पर हो जाते हैं। इस विधि से सम्पूर्ण परिवार ही कृत, कारित, अनुमोदित विधि से समग्र व्यवस्था में भागीदार होना प्रमाणित होता है।
स्वास्थ्य-संयम का मूल्यांकन :- पहले इस मुद्दे पर स्वास्थ्य और संयम के संबंध में विश्लेषण को प्रस्तुत किया जा चुका है। शरीर स्वस्थता ही स्वास्थ्य का प्रमाण है। शरीर स्वस्थता का तात्पर्य जीवन अपने जागृति को शरीर के द्वारा प्रमाणित कर सके, यही स्वस्थ शरीर का मापदण्ड है जिसकी आवश्यकता एक स्वाभाविक अपेक्षा है। संयमता यही है अनुभव मूलक विधि से सम्पूर्ण कार्य-व्यवहार का मानव परंपरा में प्रमाणित करना ही है। संयमता की महिमा व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होने और समग्र व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित करना ही है। यही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में वैभवित होने का सूत्र है। इसी का व्याख्या सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज है।
स्वास्थ्य अर्थात् शरीर स्वस्थता को बनाये रखने के लिये आहार, विहारों में संतुलन आवश्यक रहता ही है। सप्त धातु संतुलन धर्मी अथवा सप्त धातु संतुलन कार्यकारी वस्तुओं को पहचानना, निर्वाह करना, उसके पहले जानना, मानना अति आवश्यक रहता ही है। जीवन्त शरीर में शरीर जिसको हवा, पानी, अन्न, औषधि के रूप में ग्रहण करता है उसे पाचनपूर्वक अर्थात् योग, संयोग, संयोजन और शरीर कार्य विधि से रसों और धातुओं में विभाजित कर शरीर सहज आवश्यकता के अनुसार परिवर्तीकरण अर्थात् रसमूलक विधि से धातुओं में परिवर्तीकरण सम्पन्न होता है। यही शरीर में होने वाला क्रियाकलाप है। जिसके आधार पर ही शरीर संतुलन बना रहना स्वाभाविक क्रिया है। इसमें वंशानुषंगीय रचना की परिपूर्णता प्रधान रूप में आवश्यक रहता ही है। यह सहअस्तित्व में निहित विधि क्रम में वंशानुषंगीयता स्थापित रहता ही है। यही प्राण और रचना सूत्रों के रूप में होना देखा गया है। इस विधि से हमें स्पष्टतया समझ में आता है कि स्वास्थ्य संतुलन की आवश्यकता लक्ष्य के आधार पर ही आहार-विहार योजनाओं का होना देखा गया है। संतुलित आहार-विहार पद्धति इसी तथ्य पर आधारित रहता है।
शरीर को स्वस्थ रखने की कल्पना, विचार, चित्रण और मूल्यांकन लक्ष्य बोध सहज विधि से ही सुयोजित होना पाया गया है। चिन्हित रूप में शरीर की स्वस्थता जीवन जागृति की अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन योग्य विधि से उपयोगी होना ही एकमात्र लक्ष्य होना देखा गया है। यही सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज, परिवार मानव और स्वायत्त मानव तथा मानवीयता को परंपरा के रूप में स्पष्ट करना, प्रमाणित करना होता है। यही मानव परंपरा के धारकता का भी