कान से, कानों से जैसा जीभ से, न दिखकर हर वस्तु का विभिन्न आयाम उन-उन ज्ञानेन्द्रियों से पहचान में आता है। जैसे कि एक आँवले को आँखों से देखने से, जीभ से, और हाथों से देखने पर विभिन्न आयाम दिखती है, गंध से भी भिन्न आयाम दिखाई पड़ती है, आँखों से केवल आकार, आयतन, घन में से आकार आयतन का कुछ अंश समाती है और चीजें आँखों में आती नहीं। इन आँखों से देखी हुई एक मार्ग को देखने पर भी मार्ग का चौड़ाई कुछ दूरी तक लम्बाई आँखों से आता है। कहाँ तक मार्ग गया है, वहाँ तक आँखों से दिखाई आता नहीं है; जहाँ तक आदमी को जाना है वहाँ तक मार्ग है, यह तथ्य समझ में आता है।
यह भी मानव सोच कर देखा है, स्मृति के आधार पर यह सब समझकर जो आँखों में नहीं आता है वह सब सुना हुआ है। आदमी से सुनकर स्मृतियों के रूप में क्या चीज पाया यह सोचा गया। उनमें बहुत दिन तक यह मानते रहे सिर में कोई चीज है वहाँ स्मृतियाँ रहती हैं। अन्ततोगत्वा बुद्धिजीवी और तकनीकी मानव ने सिर को भी खोलकर देख लिया वहाँ भी शरीर के अंग अवयव के रचना में भागीदारी किया हुआ वस्तु और द्रव्य ही दिखाई पड़ी। इसी के साथ सूक्ष्मतर नस जालों के रूप में बिछी देखा गया। पहले से पता लगाये हुए मांसपेशियाँ भाग में था ही-आँख, कान, नाक, गल तंत्र और सिर भाग में बनी हुई ये मेधस तंत्र और मेधस तंत्र से जुड़ी हुई विधियों को अध्ययन किया जा चुका है। इसी के साथ हृदय तंत्र, फुफ्फुस तंत्र, वृक-यकृत तंत्रों को और मलाशय, गर्भाशय, मूत्राशय व अग्नाशय पक्वाशय, पित्ताशय सभी प्रकार के रस ग्रन्थियों को, गल ग्रन्थियों को, स्वर ग्रन्थियों और तंत्रों को चर्म, रस, वसा, हड्डी, रक्त, पुष्टि और कोशाओं में निहीत प्राण सूत्रों उसमें समाहित रचना विधि संकेतों तक अध्ययन करने का प्रयास मानव ने किया है। इसका अन्तिम प्रक्रिया और मूल प्रक्रिया को इस प्रकार देखा गया है कि रासायनिक द्रव्यों, प्राणकोशाओं और रचना सूत्र सम्पन्नता के आधार पर संपूर्ण रासायनिक रचनायें और विरचनायें सम्पन्न होता हुआ देखने को मिलता है। इसी विधि से प्रत्येक मानव शरीर रचनायें गर्भाशय या गर्भाशय सदृश्य वातावरण में रचित होता हुआ देखा गया। ऐसा शरीर रचना का स्वरूप ऊपर संक्षिप्त रूप में बताया गया।
रासायनिक भौतिक योग-संयोग के रूप में संपूर्ण मानव शरीर जीवों का शरीर और प्राणावस्था के संपूर्ण प्रकार अन्न-वनस्पतियों का रचना विरचना अध्ययनगम्य हो चुकी है। इन अध्ययनों में पूर्णता, परिपक्वता और समग्रता के साथ अन्तर संबंध और बाह्य संबंध प्रयोजन और निष्कर्षों को