सूत्रित है। यही आकर्षक प्रचार का तात्पर्य है। जैसा एक व्यक्ति प्रचार तंत्र विधि से बीड़ी पीता हुआ अपने निश्चित मुद्रा, भंगिमा, अंगहार सर्वाधिक वैभवशाली स्थिति में प्रस्तुत हो ऐसी बीड़ी पीने की प्रक्रिया को देखकर अनेकानेक लोगों को पसंद आ जाये। इसमें लड़कियों को पसंद आना भी एक मुद्दा रहती है। इसी प्रकार गांजा, दारू पीने की विधि में अनेकों प्रकार के व्यंजनों के साथ खाना खाने की प्रक्रिया के रूप में और उसके सजावट के रूप में, कपड़ों के पहनावा-पसंदी के रूप में अंततोगत्वा प्रचार माध्यम से जिस वस्तु को बेचना है। उसको भ्रमित लोकमानस स्वीकारना प्रचार का सफलता माना गया है।

अस्तु, संग्रह सुविधा भोग, अतिभोग, बहुभोग मानसिकता उपक्रम, प्रौद्योगिकी, विज्ञान विधि से समाज रचना उसका निरंतरता और इस पृथ्वी का नैसर्गिक संतुलन अर्थात् पृथ्वी के चार अवस्थाओं के परस्परता में संतुलन और सम्पूर्ण मानव में संतुलन चिन्हित रूप में प्राप्त नहीं हो पाता है। यह सम्पूर्ण मेधावियों में स्पष्ट हो चुका है। अतएव इसका विकल्प गतिशील होना ही एकमात्र उपाय है।

विकल्पों का प्रधान बिन्दुओं को,

  • चेतना विकास मूल्य शिक्षा-संस्कार तकनीकी शिक्षण कार्य में विकल्प,
  • ज्ञान, दर्शन, विवेक, विज्ञान विधि विचारों में विकल्प,
  • न्याय सुरक्षा विधान में विकल्प,
  • स्वास्थ्य संयम कार्य में विकल्प,
  • विचार व आचरण विधि में विकल्प,
  • व्यवहार कार्य विधि में विकल्प,
  • उत्पादन विधि में विकल्प,
  • विनिमय विधि में विकल्प,
  • उपयोग विधि में विकल्प।

इन विकल्पों को हम भले प्रकार से पहचान चुके हैं। इस विश्वास से कि हम जिन विकल्पों को अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था के सूत्र के रूप में समझ चुके हैं वह सर्वमानव में स्वीकृत है ही। जैसे प्रसंग के रूप में -

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