करने, कराने, करने के लिये मत देने के आधार पर ही इनकी विवेचना, व्याख्या सूत्रित है। वर्तमान देश, जहाँ जो रहता रहा उसे पहचानने के आधार पर, वर्तमान काल, जब जो अपने कार्य-व्यवहार, स्थिति, गति का प्रमाण प्रस्तुत किया इसे चिन्हित विधि से पहचानने के क्रम में काल की महत्ता, उपयोगिता को पहचाना जाता है। इसकी भरपाई में शिलालेख, ताम्रलेख, कालपत्र, स्मारक और वांङ्गमयों को पहचाना गया है। यह भी समझा गया है हर घटना जो मानव से अथवा प्रकृति सहज विधि से घटित हुआ करता है इन्हीं सब को किसी देश-काल में ही इंगित करना संभव है। इसलिये देश-काल का ज्ञान-परिज्ञान आवश्यक है।

हर मुद्दे पर आवश्यकता और अनावश्यकता का निर्णय हम इस विधि से पाते हैं कि निश्चित लक्ष्यगामी स्थिति-गति के लिए प्रेरक, सहायक होने के सभी तथ्यों को आवश्यकता के अर्थ में और इसके विपरीत अर्थात् लक्ष्य के विपरीत सभी प्रकार की देशकाल में हुई घटनाएँ मानव परंपरा के लिये अनावश्यक है। सम्पूर्ण मानव का मूल लक्ष्य इसकी अक्षुण्णता, अखण्डता सार्वभौमता ही है। इसका प्रमाण स्वरूप समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व है। यह दायित्व, कर्तव्य, संज्ञानशीलता, संवेदनशीलता पूर्वक हर मानव में, से, के लिये समान रूप में आवश्यक और समीचीन होना और सार्थकता का मूल्यांकन होना तथा नित्य उत्सव होना पाया जाता है। इसी अर्थ में आवश्यकता और अनावश्यकता का वर्गीकरण हो पाता है। लक्ष्य और प्रमाण के सार्थकता, सामरस्यता सहज सभी श्रुति-स्मृति, साक्षात्कार, अनुभव ज्ञान, दर्शन, व्यवहार, व्यवस्थाएँ, नित्यगति रूप में सार्थक होना पाया जाता है। इसी क्रम में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था, परिवार मानव, स्वायत्त मानव, संयोजन, योजन कार्य विधि से मानव परंपरा युगों-युगों तक सफल होने का मार्ग प्रशस्त है।

पहले इस तथ्य को स्पष्ट किया जा चुका है स्वायत्त मानव अस्तित्व सहज सहअस्तित्व वैभव के रूप में स्वयं में विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवसाय में स्वावलंबन, व्यवहार में सामाजिक रूप में प्रतिष्ठा है। यह जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन मूलक विधि से लोकव्यापीकारण होने के तथ्य को स्पष्ट किया है। ऐसे प्रत्येक मानव के सार्थक सफल और परिवार मूलक व्यवस्था का धारक-वाहक होना पाया जाता है। इस विधि से सर्वमानव, स्वायत्त मानव, परिवार मानव, परिवार व्यवस्था मानव के रूप में शिक्षा-संस्कारपूर्वक नित्य वर्तमान होने के आधार पर मानव जाति एक होने का अर्थ अपने आप में नित्य वर्तमान है। अस्तित्व सहज सहअस्तित्व विधि ही इसका मूल सूत्र है। सहअस्तित्व में ही मानव परंपरा,

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