जागृत होने की संभावना सदा बना रहता है। मानव परंपरा अभी तक जागृति क्रम में होने के कारण आदर्शों को मानते हुए और जागृति की अपेक्षा को बलवती बनाता ही आया। इसी क्रम में जागृति पद तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्ति का पृष्ठभूमि होना मूल्यांकित होता है। पुनश्च जागृति क्रम और जागृति पद में पहुँचने का पृष्ठ भूमि है। इस क्रम में जागृति की इच्छा सर्वाधिक बलवती होने की आवश्यकता रहते आया। इसी क्रम में आज स्थिति ऐसी बनी है सर्वाधिक संख्या में मानव जागृत होना अनिवार्यता में बदल चुकी है। क्योंकि जागृति पूर्वक ही व्यवस्था में जीना बन पाता है। व्यवस्था में भागीदारी स्वयंस्फूर्त विधि से स्पष्ट हो जाता है, सार्थक होता है। समझदारी के साथ ही ईमानदारी, जिम्मेदारी, भागीदारी सहज अभिव्यक्ति है। समझदारी का मूल रूप जीवन ज्ञान सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान का अविभाज्य अनुभूति और प्रमाण ही मानवीयता पूर्ण आचरण है। इसी के आधार पर जिम्मेदारी निर्वाह होना देखा गया। जिम्मेदारी का सम्पूर्ण स्वरूप मानवीयतापूर्ण आचरण ही है। मानवीयतापूर्ण आचरण समझदारी का ही फलन है। अखण्ड समाज विधि से ही मानवीयतापूर्ण आचरण का मूल्यांकन हो पाता है। मानवीयतापूर्ण आचरण विधि से समस्त मूल्य, मानवीय चरित्र और नैतिकता का अविभाज्यता प्रमाणित होता है। दूसरे विधि से मूल्य, चरित्र, नैतिकता में, से, के लिये हर व्यक्ति प्यासा है। इसलिये समझदारी का फलन रूपी मानवीयतापूर्ण आचरण विधि से मानव जाति का एकता, अखण्डता, व्यवस्था विधि से सार्वभौमता प्रमाणित होती है। इसी विधि से प्राकृतिक, नैसर्गिक और मानवीय संबंधों में समझदारी, ईमानदारी पूर्वक निर्वाह करने की संभावना समीचीन हो गई है, आवश्यकता तो है ही।
2. सर्वमानव में मानवत्व समान - मानवीयतापूर्ण आचरण मूल्य, चरित्र, नैतिकता के अविभाज्य रूप में वर्तमान होना पाया जाता है। सर्वमानव में मानवत्व ही व्यवस्था का सूत्र है। मानवत्व अपने में स्वायत्तता ही है। उसके प्रमाण में आचरण एक अनिवार्य स्थिति है। मानवत्व जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण का संयुक्त स्वरूप है क्योंकि मानव ज्ञानावस्था की इकाई है। ज्ञानावस्था का तात्पर्य ही है जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना। यह महिमा केवल मानव में संभावित, कार्यान्वित, इच्छित है। हर मानव अज्ञात, अप्राप्त, पीड़ाओं से मुक्ति चाहता है। ऐसे वैभव अर्थात् पीड़ा से मुक्त वैभव जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान के रूप में दृष्टव्य है। ऐसे वैभव का अधिकार सम्पन्नता स्वयं मानवत्व है।