चिन्हों से घायल है। इससे छूटना हर व्यक्ति चाहता है। इसीलिये अखण्ड समाज उसकी अपेक्षा, उसकी आपूर्ति स्रोत, विधि, नीति, पद्धति सर्वसुलभ होना अति आवश्यक है। इस प्रकार मानव धर्म सर्वतोमुखी समाधान है। यह सर्वमानव के लिए आवश्यक है। इसकी संभावना नित्य समीचीन है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सर्वमानव का धर्म एक ही है।

मानव धर्म परंपरा के रूप में सहज ही अर्पित होता है, प्रवाहित होता है। इसी का नाम संस्कार है। संस्कार का तात्पर्य भी पूर्णता के अर्थ में किया गया कृतियाँ और स्वीकृतियाँ है। ऐसी स्वीकृतियाँ सार्थक होते हैं। इसी का नाम होता है सम्प्रदाय। सम्यक प्रकार से प्रदायन क्रिया, सम्प्रदाय है। मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार परंपरा ही पावन रूप में संस्कार है। ऐसी पवित्रता की धारक वाहकता केवल मानव में होना पाया जाता है। इस प्रकार मानव धर्म और मानव सम्प्रदाय सर्वशुभ के अर्थ में सार्थक होता है।

मानवीयतापूर्ण धर्म और सम्प्रदाय क्रियाकलाप में सम्पूर्ण अथवा प्रत्येक मानव का सम्मति अर्पित रहता ही है। इससे स्पष्ट हुई मानव धर्म, संप्रदाय और मत अविभाज्य रूप में गतित रहने वाली सर्वशुभ कार्यक्रम है। इसी के साथ यह भी हम अनुभव किये हैं कि सर्वतोमुखी समाधानपूर्वक ही मानव धर्म और परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था सफल हो जाता है। यही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र भी है। अतएव, हम मानव मानवत्व के प्रति जागृत होना ही एक आवश्यकता है। इसी से सर्वतोमुखी समाधान सबके लिये सुलभ होता है जिससे सार्वभौम शुभ नित्य समीचीन रहेगा।

5. मानव में, से, के लिये यह धरती एक अखण्ड है। मानव भाषा कारण, गुण, गणित के अर्थ में समान है।

शून्याकर्षण की स्थिति में स्वयं स्फूर्त गति सहित एक सौरव्यूह और अनेक सौरव्यूह सहज व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करता हुआ यह सौभाग्यमयी धरती है। इस धरती में कहीं भी भाग विभाग नहीं है। सभी भाग-विभाग मानव के द्वारा बनायी गयी सीमाएँ है। यह धरती अपने में ठोस, तरल, वायु सहित रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना सहित चारों अवस्था के धारक-वाहक के रूप में प्रतिष्ठित है। हम इस सौर व्यूह में यही एक धरती को सौभाग्य सम्पन्न रूप में देखते हैं अर्थात् चारों अवस्था से सम्पन्न धरती को देख पाते हैं और कहीं ऐसा सौभाग्य सम्पन्न धरती नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसा सौभाग्य सम्पन्न धरती हो उसमें से यह भी एक है। अन्य धरती के

Page 64 of 179
60 61 62 63 64 65 66 67 68