इस समय में जो-जो शिक्षाएं दे रहे हैं उसके विकल्प में मानवीयतापूर्ण सहअस्तित्ववादी शिक्षा कार्यक्रम प्रस्तावित है। सहअस्तित्व सहज अध्ययन क्रम में हम यह पाये हैं अस्तित्व में व्यवस्था है, शासन नहीं है। इसीलिये सार्वभौम व्यवस्था शासन के विकल्प के रूप में प्रस्तावित है। इसी क्रम में शक्ति केन्द्रित शासन संविधान के स्थान पर समाधान केन्द्रित व्यवस्था रूपी संविधान मानवीय आचार संहिता के रूप में (सार्वभौम राष्ट्रीय आचार संहिता) प्रस्तावित किया है। इसके लिये कार्यक्रम का हम धारक-वाहक है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन का अध्ययन शिविर कार्यक्रमों का आयोजन करते है और शिक्षा का मानवीयकरण कार्य में तत्पर है। मानवीयतापूर्ण आचरण विधि से हम जीते ही हैं। इन सभी कारणों से हम उक्त प्रस्तावों को प्रस्तावित करते हुए प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

उक्त प्रस्तावों के आधार पर मानवाधिकार सुस्पष्ट हो जाता है फलस्वरूप परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था पूर्वक सार्वभौम शुभ रूपी समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व को सर्वसुलभ कर सकते हैं। इसकी अक्षुण्णता का होना समीचीन है। यही सर्वशुभ है।

4. सर्वमानव में मानव धर्म समान है - धर्म के नाम से विडम्बना विविध आधारों से चला हुआ समुदायों का धर्म जो रूढ़ियों के रूप में देखने को मिला है, उसकी विकरालता और अंतहीन समस्याओं से ग्रसित रूपों में दिखाई पड़ती है। किसी भी समुदाय धर्म के पास धर्म का मूल रूप अध्ययनगम्य होना संभव नहीं हुई। इसकी रिक्तता, कुण्ठा, श्रेष्ठता, नेष्ठता में फँसे हुए, विचारों के साथ मानव जनजाति अपने आप में यंत्रणा का शिकार हो जाता है, इसे बारंबार देखा जाता है। इसे वांङ्गमयों के आधार पर तर्क विधि से विद्वानों के बीच चर्चित होना देखा गया है। राज्य विधाओं में भी सत्ता संघर्ष, शक्ति केन्द्रित शासन, पीठ और चिन्ह के लिये तमाम घटनायें गुजर चुके हैं। जिसका स्वीकृति आम आदमी के मन में नहीं हो पाता है। इसलिये असंतुष्टि बना ही है। इसलिये इसकी संतुष्टि स्थली का अनुसंधान और प्रकाशन की आवश्यकता है ही।

‘मानव धर्म’ अपने स्वरूप में समाधान और उसकी निरंतरता है। दूसरे तरीके से सर्वतोमुखी समाधान और उसकी निरन्तरता है। अस्तित्व में समाधान का धारक-वाहक केवल मानव ही है। इस धरती पर आज की स्थिति में जैसा भी मानव दिखाई पड़ता है विभिन्न भौगोलिक परिस्थिति, आर्थिक सम्पदा, शक्ति केन्द्रित शासनाधिकार, सम्पन्नता, प्रौद्योगिकी, कृषि, व्यापार, उपभोक्ता संस्कृति व दलाली, उपदेश, समाजसेवा, धार्मिक कार्यक्रमों में कहीं न कहीं किसी न किसी कार्य में लगा मानव को देखा जाता है। यह सब किसी न किसी समुदायगत विचार, धर्म-पंथ, मत,

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