संबंध में हमें दौड़ने की आवश्यकता नहीं है, यह धरती में आवश्यकीय मानव जागृति, सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज रूपी परंपरा को प्रमाणित करना ही अभी इस धरती का मानव सहज कल्याण मार्ग है। इसका कारण यही है यह धरती को मानवकृत परेशानियों से दूर करने, और प्रकृति सहज नियमों को, जागृति सहज नियमों को नित्य निरन्तर पालन, आचरण और व्यवहार करता हुआ मानव मानस आज प्रमाणित होने की आवश्यकता है। यही सर्व प्राथमिक आवश्यकता है। इसके लिये धरती की अखण्डता और एकता को पहचानना एक आवश्यकता है। यह धरती भी समग्र व्यवस्था में अविभाज्य है। अतएव मानव अपने जीवन सहज जागृति परंपरा रूप में एकता, अखण्डता और सार्वभौमता को पहचानने के योग्य इकाई है। इसमें से एकता अखण्डता का मूर्त रूप यह धरती भी है। इस धरती को स्वस्थ रूप में बनाये रखना तभी संभव है जब मानव परंपरा जागृत हो जाए। भ्रम पर्यन्त अस्वस्थता की कहानी बन चुकी है।

मानव भाषा अपने स्वरूप में कारण, गुण और गणित है। इसे किसी लिपि पूर्वक संप्रेषित करें, इसका फलन एक ही होता है अर्थात् मानव की समझदारी, उसकी परंपरा के लिये भाषा प्रयुक्त होता है। कारण, गुण, गणित को किसी भी लिपि, किसी भी भाषा में संप्रेषित करने की स्थिति में उसकी सत्यता एक ही प्रकार से फलवती होती है। इस यथार्थ को समझने के उपरान्त सम्पूर्ण मानव में समझदारी की समानता का विश्वास होना अनिवार्य है। सर्वशुभ घटित होने के क्रम में समझदारी का यह भी एक आयाम है। इस विधि से सम्पूर्ण विवाद, अनर्थ प्रवृत्ति, और रहस्यता से मुक्त मानव परंपरा स्थापित होने के उपरान्त अपने-आप यह सब समाधान में परिणित हो जाते हैं। इसीलिये सर्वतोमुखी समाधान मानव के लिये समीचीन है।

6. मानवीय सभ्यता, संस्कृति, विधि, व्यवस्था सर्वमानव में, से, के लिये समान है -

संस्कृति का स्वरूप के संबंध में पहले भी सामान्य विवरण प्रस्तुत किये गये हैं। मानवीय संस्कृति का पोषण सभ्यता करती है, सभ्यता का पोषण विधि करती है, विधि का पोषण व्यवस्था करती है और व्यवस्था का पोषण संस्कृति करती है। इस प्रकार आवर्तनशीलता क्रम सुस्पष्ट है। संस्कृति का मूलरूप संस्कार है। संस्कार का मूलरूप जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान ही है। अस्तित्व और मानव से संबंधित अध्ययन बोधगम्य होना ही शिक्षा-संस्कार का तात्पर्य है। ऐसी शिक्षा-संस्कार ही मानवीयतापूर्ण परंपरा का मार्गदर्शक होता है। मानवीयतापूर्ण परंपरा अपने-आप में ऊपर कहे चारों आयाम सम्पन्न रहता ही है। ऐसी शिक्षा-संस्कार से प्राप्त स्वीकृतियों, अवधारणाओं, अनुभवों, विचार शैली सहित सर्वतोमुखी समाधान

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