है। समझदारी सहज विधि से हर व्यक्ति एक-दूसरे के साथ न्याय प्रदायिता को प्रमाणों के साथ संतुष्टि बिन्दु में पहुँचना सहज हो जाता है। इसीलिये न्याय प्रदायिता का नाम है। ऐसे न्याय प्रदायिता के रोशनी में हर व्यक्ति में प्रमाण रूपी तृप्ति बिन्दु पाने की उत्कंठा रहती है। इसलिये हर व्यक्ति न्याय प्रदायिता के साथ पूरक होना देखा गया। परस्पर पूरकता के साथ उदात्तीकरण समीचीन होना, फलस्वरूप प्रमाण रूपी तृप्ति बिन्दु पर पहुँचना कम से कम दो व्यक्ति में तृप्ति सहज साक्ष्य सत्यापित होता है। यही उभयतृप्ति का साक्ष्य है। इस प्रकार सुख और सुख की निरंतरता मानव में, से, के लिये समीचीन है।

बुद्धि के साथ विवेक - अनुभव बोधपूर्ण स्थिति में ही बुद्धि का सदुपयोग होना पाया जाता है। जीवन का दृष्टा और अस्तित्व में, से, के लिये दृष्टा जागृतिपूर्ण जीवन ही होना पाया जाता है। जागृति पूर्णता अपने में दूसरे विधि से प्रत्येक मानव में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान विधि से प्रमाणित, ख्यात और प्रख्यात हो जाता है। जागृति सहज विधि से जितने भी जीवन शक्तियों को, बलों को शरीर के द्वारा प्रयोग करते हैं उन सभी विधा और प्रक्रिया से निश्चित प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। मानव परंपरा में अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होना ही परम प्रयोजन है। इस प्रयोजन और इसकी अक्षुण्णता क्रम में भागीदारी को निर्वाह करना ही विवेकपूर्ण विचार-कार्य-व्यवहार है। विवेचना कार्य ही विवेक है। न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य ही विवेचना का स्वरूप है।

मानव पंरपरा सदा-सदा ही सुखापेक्षा में पीढ़ी से पीढ़ी में गुजरता आया है। सुख सर्वसुलभ होने का क्रम ही सार्वभौम व्यवस्था, विधि और अखण्ड समाज रचना विधि, इन्हीं दो मुद्दे के आधार पर इसकी अक्षुण्णता को पहचाना गया है। इसकी अक्षुण्णता क्रम में भागीदारी निर्वाह करता हुआ हर मानव सुखी रहता है। इसी कारणवश बुद्धि से सुखी होने का प्रयास भी और सफलता भी मानव सहज अभीष्ट है। अतएव बुद्धि का अनेक आयामों में नियोजित होना - मानव सहज वैभव है। इस क्रम में सार्वभौम प्रयोजन सिद्ध हो जाना ही सफलता है। अस्तु, बुद्धि को विवेकपूर्वक नियोजित, प्रयोजित करने की विधि से हर व्यक्ति, हर देशकाल में सुखी होना सहज समीचीन है।

संबंध-मूल्य-मूल्यांकन :- संबंध शब्द का परिभाषा स्वयं पूर्णता के अर्थ में अनुबन्ध है। पूर्णता सदा ही अपने में निरंतरता को ध्वनित करता है। निरंतरता ही दूसरे भाषा में अक्षुण्णता है। सदा-सदा से ही मानव अपने परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहता है।

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