मानव संबंधों में साम्य मूल्य विश्वास तथा पूर्ण मूल्य प्रेम है। बिना विश्वास के कोई भी संबंध का निर्वाह संभव नहीं है। संबंधों में विश्वास का निर्वाह न कर पाना ही अन्याय है।

मानव के नैसर्गिक संबंध तीन प्रकार से गण्य है :-

  • पदार्थावस्था के साथ संबंध।
  • प्राणावस्था (अन्य, वनस्पति) के साथ संबंध।
  • जीवावस्था (पशु पक्षी आदि मानवेतर जीवों) के साथ संबंध।

उपरोक्त संबंधों में उपयोगिता मूल्य दो प्रकार से गण्य है :-

  • परस्पर उपयोगिता पूरकता, उदात्तीकरण के रूप में रचना-विरचना क्रम में उपयोगिता।
  • परमाणु में विकास क्रम में उपयोगिता।

उपयोगिता का स्वरूप निम्न हैः-

  • प्राकृतिक सम्पदा (खनिज, वनस्पति) का उसके उत्पादन के अनुपात में उपयोग संतुलन के अर्थ में।
  • प्राकृतिक सम्पदा के उत्पादन में विघ्न न डालना एवं प्राकृतिक सम्पदा के उत्पादन में सहायक बनना। (नैसर्गिक पवित्रता को समृद्ध बनाए रखे बिना, मानव स्वयं समृद्ध नहीं हो सकता)
  • <strong>उत्पादन में न्याय। </strong>
  • प्रत्येक व्यक्ति द्वारा आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना।
  • प्रत्येक व्यक्ति में आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने योग्य कुशलता व निपुणता को स्थापित करना, जिसका दायित्व शिक्षा-संस्कार समिति को होगा।
  • उत्पादन के लिए व्यक्ति में निहित क्षमता योग्यता के अनुरूप उसे प्रवृत करना जिसका दायित्व “उत्पादन कार्य सलाहकार समिति” का होगा।
  • उत्पादन के लिए आवश्यकीय साधनों को सुलभ करना इसका दायित्व “सहकारी विनिमय कोष समिति” का होगा।

उत्पादन कार्य सामान्य आकांक्षी (आहार, आवास, अलंकार) महत्वाकांक्षी (दूरदर्शन, दूरगमन, दूरश्रवण) संबंधी वस्तुओं के रुप में प्रमाणित होना।

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