एक बात पर विचार करें कि रहस्य की पृष्ठ-भूमि पर हम जो कुछ भी कहेंगे उसके मूल में यदि रहस्य ही है तो क्या स्पष्ट होगा? शिक्षा की वस्तु क्या होगी? शिक्षा का वस्तु, विश्लेषण और प्रयोजन क्या है? बिना इन दोनों के शिक्षा का कोई अर्थ नहीं है। किसी भी वस्तु का आधार जब रहस्य हो जाता है तो उस वस्तु से या रहस्य से कोई हम वाद-विवाद विहीन सूत्र नहीं पा सकते। चूंकि प्रत्येक व्यक्ति में कल्पनाशीलता और चिंतन-शीलता सहज वर्तमान है, यदि मैं रहस्य और कल्पनाशीलता से कुछ सूत्र निकालता हूँ तो आप दूसरा सूत्र निकाल देंगे, तो विवाद होगा ही। वाद-विवाद का परिणाम हम विगत में भुगत चुके हैं। मेरा निर्णय, अनुभव व ज्ञान यही कहता है कि मनुष्य शिक्षा अथवा व्यवस्था अथवा आचरण अथवा व्यवहार अथवा व्यवसाय के आधार पर जो भी सूत्र निकालेगा वह अस्तित्व के आधार पर होगा। अस्तित्व में जो है नहीं उसका कोई आधार नहीं है। उसका कोई सूत्र भी नहीं है।