में समाधान पाता है तब संतुलित होता है, समाधान आने से सुखी होता है। मानव धर्म सुख है। समाधान में हम सारे मानव समान हैं, मानव धर्म में हम सभी समान है। मानव का अनेक धर्म नहीं होता है, केवल मानव धर्म ही होता है। गीता में क्या कहा- सर्वधर्मान्परित्यज्य- बहुत सारे धर्म को हम ओढ़े हैं, उसको उतार कर करके हमारे पास आओ बोला। जिसको हम पूजा करते हैं। हम किए हैं, मैं अपनी बात कह रहा हूँ, बाकी लोगों को क्यों कहने जाऊँ। ऐसी बातों को हम पूजा किए हैं। हमको कैसा लगा होगा ये समझ में आने के बाद, आप ही सोचो। हमको ये समझ में आया कि मानव धर्म एक ही है, शाश्वत है, उसमें बदलने की जगह नहीं है, जब कभी होगा मानव धर्म- सुख ही होगा। सुख होने के लिए समाधान ही एकमात्र उपाय है। समाधान केवल समझदारी से ही आता है, दूसरा किसी विधि से पसीना बहाने से आता नहीं है और तलवार चलने से आता नहीं है, और किसी विधि से आएगा नहीं। समाधान आएगा समझदारी से, ये बात को हम पा गए। समझदारी आने से क्या हुआ अखंड समाज सूत्र तो बन गया, मानव धर्म एक होने से, जाति एक होने से और उसके आधार पर संस्कृति, सभ्यता को विकसित कर लेने से अखंड समाज सूत्र तो आ गयी। उसके बाद सार्वभौम व्यवस्था की बात आती है। सार्वभौम व्यवस्था का मतलब है- सम्पूर्ण धरती पर व्यवस्था। क्या चीज़ है वो? खनिज संसार का संतुलन, वनस्पति संसार का संतुलन, जीव संसार का संतुलन। कौन बनाए रखेगा, मानव बनाके रखेगा कि कोई ओर बनाये रखेगा? मानव खनिज संसार का संतुलन बनाये रखेगा, वनस्पति संसार का संतुलन बनाये रखेगा, जीव संसार का संतुलन बनाए रखेगा, फलस्वरूप जीने देगा जीएगा। क्या बात है ! इसमें कोई पसीना बहाना है? यदि असंतुलित रहेगा तो क्या होगा- धरती बीमार होगी, ऋतु असंतुलित होगी, मानव दुखी होगा। मानव सुखी होने के लिए जीने देना बहुत एक प्रासंगिक वस्तु है।
तो जीने देना ही जीने के अधिकार का मतलब हुआ। वैसे ही मनुष्य के साथ तो जीने देना बहुत स्वाभाविक बात है। जीने दिये बिना जीना बनता ही नहीं। मानव, मानव को जीने दिये बिना जीना तो हराम होगा ही। ये बात अनेक जगह में देखने को मिल रहा है। इस सब के आधार पर जीने देना जीना बहुत आसान game है, इसके लिए समझदारी एकमात्र उपाय है, समझदारी के साथ ही हम जीने दे पाएंगे, जी पाएंगे।
इस ढंग से मानव जाति एक, मानव धर्म एक, बात ये हो गई ये दोनों समझ में आने के बाद हम सार्वभौम व्यवस्था के बारे में सोचना शुरू करते हैं। सार्वभौम व्यवस्था में ये सारे संतुलन आ गये, संतुलन के साथ जीने के लिए हम योजना बनाते हैं, तब मानवीय आचार संहिता रूपी संविधान बनता है। संविधान के अनुसार जो मानवीयता पूर्ण आचरण करते हुए यदि जीता है, इनमें पूरा का पूरा चारों अवस्था में संतुलन बना रहेगा और सदा-सदा समाधान बना रहेगा, निरंतर सत्य में अनुभव होता रहेगा और मानव जाति सुखी रहेगा इस बात को हम पहचाने। इस बात को अपन पहचाने, इसको पहचानकर के सार्वभौम व्यवस्था के बारे में सोचने लगे। इस को कैसे माना जाए?
पहले अभी ये माना जाता है, एक ऐसे विधि जो सभी देश अपना-अपना जैसा बना है, उसके साथ एक जगह में मिल-बैठ करके कुछ सोचा जाए। सोचने में क्या आया तो पहले ये आया इनके साथ युद्ध करना है, उनके साथ युद्ध नहीं करना है। इनके साथ युद्ध करने में कौन-कौन मिलकर के युद्ध करेगा। अभी जैसे इराक़ पर लंदन और अमेरिका दोनों मिल कर के युद्ध किया। अफगनिस्तान में युद्ध किया लंदन और अमेरिका मिलकर के युद्ध किया। इस ढंग से काम चल रहा है। लंदन क्यों जुड़ा है अमेरिका के साथ, क्योंकि अफ्रीका के साथ उनको युद्ध करना है। अभी बताया ना कपाल मोक्ष हो रहा है। जूते के तले रहे सारे अफ़्रीकन, अभी इनके सिर पर चढ़ लिए कि नहीं। अभी मंडेला जब