ये सब चीजों को देखने से पता लगता है मनुष्य जीव चेतना वश अपना-पराया को पनपाया, उससे दुःख पाया, यही बात कहा जा सकता है। दूसरा कुछ कहना बेकार है। वो दुःख से मुक्ति पाना चाहता है, ये भी अपन बोले हैं। उसके आधार पर कहते हैं मानव जाति एक है इस बात को पहचानने की आवश्यकता है। मानव जाति एक है इसको पहचानने की इतनी विधि बताया। धातुओं के आधार पर, नस्ल, रंग के आधार पर बताया।

उसके बाद आता है- संप्रदाय। संप्रदाय के आधार पर। संप्रदाय शब्द का अर्थ क्या होता है? समान प्रकार के प्रदाय हो जाओ। पूर्णता के अर्थ में समान रूप में सबके लिए प्रदाय हो जाए इसका नाम है ‘संप्रदाय’। कितना पवित्र अर्थ रखा हुआ है! पवित्र अर्थ को कहाँ ले गए, तमाम लड़ाई-दंगा, बम गिराने की जगह में ले गए। ये बात ऐसा हुआ कि संप्रदाय विधि से हम एक हैं। ये भी माना जा सकता है, ये जो संप्रदाय, ज्ञान, विवेक, धर्म, पंथ सबको जोड़ने पर यही माना जाता है धर्म गद्दी। मानव धर्म ही एक ! क्या है मानव धर्म ? मानव धर्म सुख है। हर व्यक्ति सुखी होना चाहता है इसमें दो राय नहीं। सुखी रहना चाहते हुए भी सुखी हो नहीं पा रहे हैं, ये परेशानी है। क्यों, अनेक जात, मत, संप्रदाय होने के आधार पर , हर दिन नया विपदा तैयार रहता ही है। विपदा तैयार करने वाला भी आदमी ही है। अभी जैसा युद्ध के लिए बहुत सारे युद्ध सामग्री तैयार किया, उसको एक प्रयोग किया, उससे प्रतिक्रियाएँ मनुष्य के लिए विपदा बना है। जितने भी nuclear test हुआ है, उन सबका प्रतिफल मानव के लिए विपदा बना। इन बातों को हम सब ध्यान दे सकते हैं। इन विपदाओं से मुक्ति पाना हम चाहते हैं। विपदाओं से मुक्ति पाने के लिए विधि क्या बताया मानव जाति एक है, मत एक है, संप्रदाय एक है और धर्म एक है, इस बात को समझने की आवश्यकता है। इसको समझने पर क्या हो जाता है? अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था दोनों को पहचानने की आवश्यकता आ जाती है। यदि मानव जाति एक होगा तब सार्वभौम व्यवस्था होगी। वो सार्वभौम व्यवस्था क्या होगी उसको पहचानने की बात आती है। अखंड समाज होने पर ही सार्वभौम व्यवस्था होगी, अखंड समाज होने के लिए इन आधारों पर अपन अभी थोड़ा ध्यान दिए हैं।

इसके बाद बात आती है भाषा, मानव भाषा एक है। कैसे? मानव भाषा एक है- हम पहचाना है, कारण, गुण, गणित के रूप में मानव भाषा एक है। किसी भी भाषा में कारण, गुण, गणित को प्रयोग करने पर ही सच्चाई का पहचान हो पाता है। कारण के रूप में क्या निकलता है, सहअस्तित्व मिलता है। मूल कारण सहअस्तित्व मिलता है। पूरा संसार के जागृति तक के जो कारण हैं, विकास क्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति का कारण सहअस्तित्व ही है। सहअस्तित्व क्या किसी ने बनाया है, पूछा तो किसी ने बनाया नहीं है। ये कैसा रहता है, ये शाश्वत रूप में रहता ही है। होने के रूप में ही हम देख पाते हैं, होने का अध्ययन हो पाता है। नहीं का अध्ययन नहीं हो पाता। यह होने का अध्ययन है, ना होने का कोई अध्ययन नहीं है। होने का अध्ययन करने पर पता चलता है- सहअस्तित्व ही अस्तित्व है, होने के रूप में सहअस्तित्व ही है। इसके आधार पर हम चलते हैं, ये समझ में आने से हम समाधान की जगह में आते हैं। समाधान का फलन ही है मानव धर्म -सुख। सहअस्तित्व को समझे बिना समाधान फलित होता ही नहीं। कैसे भी कर लें, कितने भी सर कूट लें, मगजमारी कर लें कुछ नहीं होगा। समाधान यदि होगा सहअस्तित्व के आधार पर ही होगा। जब कभी भी होगा। वो चीज़ हम पा गए। इसके आधार पर हम कह सकते हैं हर व्यक्ति सहअस्तित्व को समझ सकता है, हर व्यक्ति समाधानित हो सकता है। इसके आधार पर मानव धर्म एक होना समझ में आता है, क्योंकि समाधान ही सुख है। समाधान, समृद्धि ही सुख, शांति है ये हम पहचान लिए हैं, इसको practical किए हैं, जिए हैं, प्रमाणित किए हैं, इसके आधार पर हम घंटी बजाकर कह सकते हैं मानव धर्म सुख है। मानव धर्म का

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