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भाग – 19
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जिज्ञासा: आपने अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था की बात बार-बार कही है, इसको सामान्य रूप में कैसे समझें, ताकि हम लोग भी उस दिशा में आगे बढ़ सकें?
उत्तर: तो अखंड समाज के बारे में बारम्बार कहा, सार्वभौम व्यवस्था के बारे में बारम्बार कहा इस बात को कैसे समझें। पहले अखंड समाज को समझ लेने का विधी, मानव जाति को एक रूप में मानव जाति एक है इस बात को अपने को समझना है। इसको कैसे समझा जाए? अभी मानव जाति को जैसा जीवों के सदृश्य अनेक जाति मानकर के पहले से अपन चले। अनेक जाति मानने का आधार वही रहा। सर्वप्रथम नस्ल रहा, नस्ल के बाद रंग आया, रंग के बाद आया कबीला और कबीला के बाद आ गया संप्रदाय। मत, भाषा, पंथ और उसके बाद कार्य के आधार पर जातियां रहीं। इस ढंग से जाति, मत, संप्रदाय, पंथ आदि के आधार पर हम पूरा का पूरा मानव जाति को अनेक समुदायों में पहचाने। किस आधार पर- भाषा, जाति, मत, संप्रदाय, रंग, नस्ल, वर्ग के आधार पर। सात आधार पर हम अपना-पराया को विभाजित कर चुके। इसी के आधार पर धर्म और राज्य दोनों इसमें सहमत हैं। धर्म भी समुदायों के प्रति सहमत है और राज्य भी सहमत है। राज्य शासन भी, संविधान भी एक समुदाय एक क्षेत्रफल में रहा हुआ आदमियों के साथ ही संविधान को बनाया। इसी प्रकार के अनेक प्रकार के संविधान बने, अनेक देशों में संविधान बने, अनेक देश हुए, अनेक देश में अनेक संविधान बने, अनेक भाषा हुए, अनेक प्रकार के मत हुए, संप्रदाय हुए, पंथ हुए, इसके आधार पर वर्ग हुए और इसके पश्चात आदमी का अपना-पराया का दीवालें इस ढंग से बड़े-बड़े होते गए। इसमें सबसे बड़ा दीवाल राज्य और धर्म की है। अपने पराए का विभाजन राज्य विधि से, धर्म विधि से आता है। धर्म विधि से समुदाय चेतना काफी कठोर है।राज्य विधि से उससे कम कठोर है। धर्म विधि से जो कुछ भी आदमी अपने को मान लेता है हम जिस जात के हैं वो जात के आधार पर वो धर्म को मानता है उसके पश्चात उसी को रट लगता है, बाक़ी को धर्म मानता ही नहीं। इस ढंग से लोग नाना प्रकार की बात करते हैं। केवल कहते हैं कि हम एकता चाहते हैं। एकता चाह कर अनेकता की बात काहे को करते हैं, ये बात आई, तो बात आने पर वो कहते हैं- अनेकता को बताए बिना एकता कैसे होगा? ये प्रति प्रश्न हो गया। ऐसे सब वाद विवाद का आधार बना हुआ है ये। इन सभी आधारों को देखते हुए, सुनते हुए, और जीते हुए, अभी इस निष्कर्ष पर आ गये कि मानव जाति है। मानव जाति होने का आधार- मानव जाति शरीर और जीवन का संयुक्त रूप में है। जीवन नहीं रहेगा तभी भी जाति नहीं है और शरीर नहीं रहेगा तभी भी जाति नहीं है। शरीर और जीवन का संयुक्त रूप में ही हर जातियां पहचान में आए हैं। अब मानव जाति एक है इस बात को पहचानने के लिए पहले शरीर के बारे में सोचा जाए। शरीर के बारे में ये देखा गया- काले आदमी हो गोरे हो, पंडित हो, मूर्ख हो, ज्ञानी हो, अज्ञानी हो, लफंगे हो, लुच्चे हो या केवल अत्यंत संयत व्यक्ति हो, तपस्वी हो और बहुत ज्यादा दरिद्र हो, बहुत ज्यादा धनी हो, तो ऐसे विभिन्न प्रकार के ऊँच-नीच की बात होता है उन सभी आदमियों को जाँचने पर ये पता लगता है, और सभी रंग वाले जितने भी जाति हैं, वो सभी के रक्त का वर्गीकरण उतना ही होता है जितना एक जाति में होता है।