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भाग – 20

👉 विडिओ संदर्भ देखें: Satsang Raipur Bhag-20

जिज्ञासा: बाबा पिछले दो दिनों से हम लोग आपको सुनते रहे। आदमी से शुरुआत करके आपने सम्पूर्ण सृष्टि को, इस ब्रह्मांड को, आदमी के इतिहास को, आदमी की वर्तमान स्थिति को, भविष्य को पूरा का पूरा निचोड़ दिया है इन सूत्रों में, हम लोग जैसा महसूस करते हैं। और हम लोगों ने जो कुछ भी सुना, जैसा पसंद किया, तो एक मंशा यह भी रही है, आपकी सारी बातों को ज्यों का त्यों record करके हमारे जैसे और हज़ारों-हजार आदमियों के लिए वो उपकारी हो जाए, एक मार्गदर्शन का काम करे। और जहाँ पर हम लोग भ्रम में या संशय में फसते हैं, वहाँ हम लोगों को संशय और भ्रम से निकालने में आपका वक्तव्य ज्यों का त्यों recorded रहे, इस उद्देश्य से हम लोगों नें इसको record किया। ऐसा लगता है कि समय के लिहाज से दो दिन बीते हैं, जैसे हम लोगों ने एक विश्व ब्रह्मांड की एक बहुत लम्बी यात्रा पूरी कर ली हो, इन दो दिनों में। इतनी सारी बातें, दर्शन से लेकर आदमी तक, इतिहास तक, प्रकृति तक और कला, साहित्य, संगीत और कितने- कितने सारे आयाम, जिन बातों को at a glance, एक नज़र में हमने सोचा भी नहीं था, सारी बातें हम लोग और सभी लोग सुनते रहे। हम लोग चाहते हैं बाबा कि अब जो कुछ भी आपने कहा, और जो आपने कहा वो आपका जाना हुआ है, इसलिए उसकी बहुत महत्ता, उसकी बहुत महिमा है हम लोगों के दिलों दिमाग में, तो उसको अंतिम सार के रूप में, आप पाँच-छः minute के भीतर उस अंतिम सार को, जो आप कहना चाहते हैं, जो आपका जाना हुआ है, उसको आप कह दीजिए। 

उत्तर: बहुत बढ़ियाँ, बहुत सहीं, स्वागतीय। ये तो स्वागत करने की मुद्दा ही है। अभी शुरू किये थे अपन मानव से, मानव को एक समझदर आदमी के रूप में पहचाना, समझदारी का तड़प आदि मानव से रहा है। समझदारी के अर्थ में अपन कुछ किए हैं, उसका स्वरूप को प्रस्तुत किये हैं। समझदारी के आधार पर मनुष्य सही ढंग से जिएगा, दूसरा- नासमझी से गलत ढंग से जिएगा। ये बात है। उसके बारे में अपन ये तय किए जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तन। ये जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तन के बाद, मानव चेतना से देव चेतना, देव चेतना से दिव्य चेतना श्रेष्ठ होने के बात एक सूचना के रूप में प्रस्तुत किया। ये क्रियान्वयन होने की विधि ये बताया है, कि मानव चेतना में परिवर्तित होने के पश्चात देव चेतना निकट होता है। अभी जीव चेतना के लिए मानव चेतना निकट है, वैसे ही मानव चेतना के लिए देव चेतना निकट हो जाता है और देव चेतना में दिव्य चेतना निकट हो जाता है। इस ढंग से दिव्य चेतना की निरंतरता धरती का ब्रह्मांड का अनंत का मंगलमय कार्यक्रम है। ये मैंने बताया, एक छोटी सी स्वरूप में संक्षेप ये है। एक विधि ये हो गया। 

दूसरी विधि से ये बताया- हमको अस्तित्व को समझने की ज़रूरत है। अस्तित्व को समझने से सहअस्तित्व है। सहअस्तित्व ही विकास क्रम विकास, जागृति क्रम जागृति के रूप में स्पष्ट है। जागृति क्रम जागृति ही निरंतर रूप में रहता है, ये सर्वमंगल कार्यक्रम है। ये दूसरा बात बताया। 

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