तीसरे विधि से ये बताया- मानव जो है ना जब कभी भी समझदार होता है समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व सहज विधि से प्रमाणित होगा, ये सार्वभौम विधि से सर्व मानव के लिए, सर्व वस्तु के लिए, सर्व अवस्था के लिए, सर्व पद के लिए मंगलमय कार्यक्रम, शुभ कार्यक्रम है बताया। तीन विधि हो गई। 

चौथा विधि में ये बताया- मानवीय संस्कृति, सभ्यता, विधि, व्यवस्था के रूप में जीने से सर्वशुभ है, ये बताया। मानव अपने में मानवीयता पूर्ण विधि से जागृत होकर के जीना सर्वशुभ कार्यक्रम में सतत जीता है, इस बात को आगाह किए। उसके बारे में ये भी प्रयत्न किया है, जो लोहा में लोहत्व पर हम विश्वास करते हैं, मानव में मानवत्व के प्रति कोई विश्वास अभी तक हुआ नहीं, इसीलिए जीव चेतना मे हैं हम। इसका प्रमाण प्रस्तुत किया, इसमें अपने को आना चाहिए। जो अध्यात्मवाद जैसा ऋषि जनों का मुखारविंद से आया हुआ में भी ये जगत को माया बताया, जगत मिथ्या बताया, वो कितने संकट से कहा होगा सोचने की मुद्दा है। संकट से छुटकारा पाने के लिए तो उपदेश दिए, किंतु शायद संकट से सब कोई छुटकारा पाएगा इस बात को वो घोषणा नहीं कर पाए। शायद है, अभी उन्हीं के वंशज, आप-हम, ऐसे जगह में आए हैं- सर्व मानव सुख रूप में जी सकता है, समाधान पूर्वक जी सकता है, सबके लिए उपकार करता हुआ जी पाएगा, सुख से जी पाएगा, इस बात के लिए अपन प्रस्तुत किए हैं। ये सर्व शुभ कार्य के लिए सदा-सदा के लिए युग-युग के लिए ये उपयोगी होगा मैं ऐसा सोचता हूँ। उपयोगी होने के लिए आपने जो बात बताया है, तो ये पूरी बात record हो जाए, वो जब कभी भी अपने की संदिग्ध होने पर वो record के आधार पर अपन सोचा जाए, व्यर्थ की वादाविवाद ना हो, क्योंकि वादाविवाद के लिए पूरा फाड़ ही बना है। क्योंकि भ्रमित आदमी वादाविवाद के अलावा कुछ जानता ही नहीं है, चाहे घर में हो, बच्चों से हो, बड़ों से हो, अड़ोस से हो, पड़ोस से हो, गाँव से हो, धरती से हो, माने संसार से हो, कहीं से भी हो हम वादाविवाद के अलावा कुछ जानते ही नहीं है। गाड़ी में चलते हैं वादाविवाद, घाट में जाते हैं वादाविवाद, बाज़ार में जाते हैं वादाविवाद, घर में जाते हैं वादाविवाद। क्या मतलब, इस ढंग से कहाँ पहुँचेंगे? कहीं पहुँचने की जगह बना नहीं। जिसको university कहते हैं, वहाँ जाओ वादाविवाद। ठीक बात है ना, अपन भुक्त भोगी हैं ना? तो उसके बाद कहाँ खोजा जाए। universities में विद्वानों का गढ़ है, वहाँ जब वादविवाद है तो क्या हालत है। 

जय हो, मंगल हो, कल्याण हो। 

जिज्ञासा: बाबा हम सब लोगों के लिए, वैसे तो जो कुछ आपने कहा वो मानव जाति के ऊपर आशीर्वाद है, लेकिन दो शब्द आशीर्वाद के सब लोगों के लिए और कह दीजिए। 

उत्तर: अभी ये आशीर्वाद के पात्र आप लोग हैं ही, ऐसे पात्र हैं, अभी तक ये माना गया ज्ञान, विवेक, विज्ञान सम्बन्धी बात इतना दुरूह है, किसी के पल्ले नहीं पड़ता, ऐसा सोच के चलाये थे। तो विज्ञान विधा में नाशकरी कार्य तो समझ में आया, बचाने वाला कार्य तो विज्ञान में समझ में नहीं आया आज तक। तो इससे ये सब बात बचाने वाला कार्य होने के कारण से आप लोगों में कहीं ना कहीं मंगलमय कार्य के लिए जगह है, शुभ करने की इच्छा है, शुभमय जीने की तमन्ना है, इसका प्रतीक रूप में आप लोगों ने इतने अच्छे ढंग से तन-मन से प्रस्तुत होकर पूरे बात को सुना है, कहीं ना कहीं स्वीकार भी हुआ होगा, वो किसी ना किसी अंश में प्रमाणित भी होगा, सदा-सदा के लिए अगे पीढ़ी के लिए आप सब प्रेरणा स्रोत बनें, यही मेरा आशीर्वाद है।

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