अध्ययन कैसे पहुँचा? सहअस्तित्व समझ में आने से समाधान, समाधान होने से मानव धर्म- सुख। और श्रम से समृद्धि- तो श्रम करने पर अपने परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन, फलस्वरूप समृद्धि का अनुभव। समृद्धि का अनुभव होने से उपकार प्रवृति बनती है। कुछ देने की ही इच्छा होती है, लेने की इच्छा खत्म होता है। ऐसा जगह में आता है। मनुष्यों में उपकार करने वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ने की बाद संसार में दरिद्रता कहाँ है। जब हर परिवार में हो गया तब उपकार किसका करोगे- पूछा एक आदमी, तो अपने आगे की परम्परा का उपकार करेगा, उपकार करने की जगह बना ही रहेगा। पूछने वाला तो सब पूछ ही लेता है। वो तो स्वाभाविक है बुद्धिमानी का स्वरूप है।
इस ढंग से हम मानव जाति एक होने की बात पा सकते हैं। किस विधि से- शरीर रचना विधि से, और मानव धर्म विधि से, दोनों विधि से हम मानव जाति एक है इसको पहचान सकते हैं। इसके लिए हम पूरा अध्ययन क्रम प्रस्तुत किये हैं। उसके बाद तीसरा बिंदु ये है, हम जितने भी समाधान पाते हैं अस्तित्व में, अस्तित्व के लिए, अस्तित्व से जो हम समाधान पाते हैं, ये समाधान सदा-सदा उपलब्ध है। इससे क्या हो जाता है- मानव धर्म सदा-सदा है। कोई एक दिन है, एक दिन नहीं है ऐसा कुछ नहीं है, मानव धर्म सतत है। इसलिए अपने को हम जो पाते रहे, संवेदनशीलता में सुख भासता रहा, सुख की निरंतरता चाहिए ये अभीप्सा रही है, उसकी सफलता इस जगह में बना हुआ है।
उसके बाद आता है- जीवन अमर है और शरीर जीवन के लिए एक घटना है। कैसे- रचना-विरचना, शरीर में रचना भी होता है, विरचना भी होता है। यह जीवन के लिए घटना है, अपनी जागृति को प्रमाणित करने के लिए घटना। यह घटना कभी बंद हो सकता है? बिलकुल बंद नहीं होना, सदा सदा बना रहना है। ये धरती नष्ट हो जाए दूसरा धरती पर आदमी रहेगा ही। जीवन को रेंगने में देर नहीं लगता। इस तरह आदमी अपने धर्म के प्रति निरंतर संभावनाओं को पा सकता है। यदि ये ज्ञान होता है, मानव धर्म की निरंतरता समझ में आता है और मानव जाति एक होने का आधार बनता है। मानव जाति एक, मानव धर्म एक। ये दोनों बात समझ में आने से मानव के साथ हम क्या सम्बन्ध बनाना चाहिए, कैसा जीना चाहिए, क्या करना चाहिए ये शुरू होती है। ये सब शुरू होने से हम अखंड समाज की बात को रख दिया। अब अखंड समाज यदि पूरा होता है तब सार्वभौम व्यवस्था की बात आती है। अखंड समाज सूत्र व्याख्या- मानव परम्परा में प्रमाणित हो गया, उसके बाद अपने आपसे सार्वभौम व्यवस्था की बात आयी। सार्वभौम व्यवस्था क्या है? भौम माने भूमि, भूमि सर्वस्व के साथ हम व्यवस्था सोचते हैं। क्या है वो- खनिज के साथ व्यवस्था, वनस्पति संसार के साथ व्यवस्था, और जीव संसार के साथ व्यवस्था, मानव संसार के साथ व्यवस्था। मानव संसार के साथ व्यवस्था का सोचा ज्ञान अवस्था के आधार पर, मानव का व्यवस्था ज्ञान के आधार पर होगा। ज्ञान समाधान में प्रमाणित होगा, समाधान के आधार पर ही व्यवस्था होगी। समाधान क्या चीज़ है? सुख का स्रोत। सुख के स्रोत के लिए व्यवस्था होगी। मानव के लिए सुख का स्रोत ही इष्ट है। ये पूरा होने के लिए ये व्यवस्था है। मनुष्य सुखी होने के लिए क्या चाहिए? जीव संसार संतुलित रहना है, वनस्पति संसार संतुलित रहना है, और खनिज संसार संतुलित रहना है। इसका मतलब धरती संतुलित रहना है। धरती संतुलित रहने से क्या मतलब? ऋतु काल व्यवस्था है ये हमारा किया हुआ नहीं है, ये प्राकृतिक है। प्रकृति अपने में संतुलित रहने के जैसा हमारा दिनचर्या बनाने की आवश्यकता आ गई। इसलिए हमारे दिनचर्या में हम वनस्पति संसार, जीव संसार और खनिज संसार संतुलित बनाए रखते हुए हम संतुलित रहने की अधिकार बनता है। इससे क्या होता है- दूसरे को जीने दो जियो ! जीने दो जियो की दूसरा एक घाट पाए। उसको आप को सुनना चाहा इसलिये आपको जगाए। तो अभी हम लोग यहाँ पहुँचे। अपने आप से, इसमें कोई पसीना बहाए हैं ऐसा कुछ नहीं है। साधारण रूप में मनुष्य जब अपने संतुलन में जीना के प्रमाण