माने काले रंग की आदमी में कितने प्रजाति का रक्त हो सकता है, उतना ही प्रजाति का रक्त एक गोरे रंग के आदमी में भी होता है। इसको देख लिया गया है। इस तरह रक्त के आधार पर मानव जाति एक है इसको कहा जा सकता है। उसके बाद रक्त के साथ और धातु होते हैं जिसको हम सप्त धातु गिनाते है, उसमें प्रधान रूप में गिनाते है रस। रसों को २४ प्रकार से हम लोग आयुर्वेद में पहचानते हैं। अभी जो Laboratory में २० या १८ प्रकार के रसों को पहचान लिया है। तो इन रसों के तात्पर्य मे भी सभी शरीर में, गोरा शरीर हो, काला शरीर हो सभी में उतना ही प्रकार का रस होता है। उसके बाद मांसपेशियाँ, मांसपेशियाँ पिंडली की यहाँ की वहाँ की सब जगह को मिलाकर के काले आदमी में भी उतना ही होता है, गोरे आदमी में भी उतना ही होता है, ये देख लिया गया है। उसके बाद आता है मज्जा, मज्जा के बारे में देखा गया, सभी का मज्जा एक ही सा होता है। ये मांस रस को मज्जा कहते हैं, ऐसे मज्जा सब आदमी के साथ एक ही सा होता है। इसके बाद खून तो सभी में एक ही सा है चार हो गया। उसके बाद पाँचवाँ आता है नस- स्नायु खून को दौड़ने के लिए जितने भी स्नायु हैं, वो सब का सब सभी के शरीर में एक ही है, और क्रियावाही तंत्र इसका नाम है। ज्ञानवाही तंत्र इसके साथ चलता है वो भी गोरे आदमी काले आदमी में सब में समान है। इस ढंग से छह हो गया। छटवा धातु है हड्डी, हड्डी का रचना जैसा एक कला आदमी के शरीर में बना है, वैसा ही गोरा आदमी के शरीर में भी बना है। वसा- वसा भी जैसा कला आदमी का वसा होता है वैसा ही गोरा आदमी का वसा होता है। इस ढंग से सप्त धातुओं को हमने पहचाने हैं! इन सप्त धातुओं के आधार पर देखेंगे तो सब में समानता दिखती है, इसलिए मानव जाति एक है। इस प्रकार रक्त के आधार पर हो गया और सप्त धातुओं के आधार पर हो गया, दो आधार हुआ।
इसके बाद आता है, मानव संतान के मूल में प्रजनन विधि- काले आदमी में भी वैसा ही है और गोरे आदमी में भी वैसा ही है। ये भी एक हो गया। इसीलिए प्रजनन विधि में भी मानव जाति एक है, इसको पहचाना जा सकता है। अब रह गया आहार- आहार में अभी तक हम मानव जाति को पहचाना नहीं! उसके बारे में बाद में बात करेंगे! इससे क्या परेशानी है, आराम है उसके बारे में बात करेंगे! जहाँ तक सप्त धातुओं के सम्बंध में बात हो गयी मानव जाति एक है ये पता लगता है। चाहे रंग काला हो चाहे रंग गोरा हो, , ये पता लग गया। ये जाति के बारे में ये आधार बने। ये आधारों को अपने को ध्यान में लाना ज़रूरी है, ज़रूरी नहीं है, आप लोग सोचा करो। मेरे अनुसार बहुत जरूरी है। ये सब बातों को ध्यान में लाना आवश्यक है।
उसके बाद मानव जाति एक होने का दूसरा एक आधार बना कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता गोरे आदमी के साथ भी वैसा ही है और काले आदमी के साथ भी वैसा ही है। इस प्रकार से अपना-पराया का दीवाल खड़ा करके बहुत सारा अपराध, ज्यादती एक दूसरे के साथ कर लिया। जैसा गोरे आदमी काले आदमियों को जानवरों के जैसा बांध-बांध करके, steamer में भर-भर करके, चौहट्टा में रख करके, भेड़-बकरी को जैसा बेचते हैं वैसा बेचा गया, गोरे लोग। उसका बदला बनेगा कि नहीं बनेगा, प्रतिक्रिया बनेगा या नहीं बनेगा? अभी जितने भी मुक्केबाज़ी के round होते हैं, वहाँ गोरे आदमी मिला तो एक मारा और दो फाँकी खोपड़ी! अब वो ring में गोरे आदमी दिखना बंद हो गया, या विरल ही दिखता होगा, उसका खोपड़ी टुकड़ा होगा। एक जगह में तो खत्म हो गया। अब उसके बाद दोड़ने में, गोरे लोग पीछे हो गये। देख रहे हो कि नहीं आपको दिखता है कि नहीं, ठीक है। ये क्यों हो रहा है? बदला लेने की भावनाओं से हो रहा है। अभी इसके आधार पर और भी आगे जो होगा होगा, अभी चालू है।