एवं धरती का उर्वरक संतुलन का एक सूत्रता बन पाता है। इसी क्रम में मानव सहअस्तित्व वैभव प्रतिष्ठा पाने का सूत्र आहार पद्धति पूर्वक भी प्रमाणित होता है।
मांसाहारी प्रणाली-प्रकिया से इस धरती पर ज्ञानावस्था के मानव परंपरा में जितने भी संतान हैं और रहेंगे और रहे हैं इनमें से कोई ऐसा इकाई अर्थात् एक मानव ऐसा नहीं मिलेगा जो हिंसा-अहिंसा के रेखा का प्रमाण प्रस्तुत किया हो। यह मानव कुल का सौभाग्य है दूसरा भाषा में ज्ञानावस्था का सौभाग्य है कि जीवन ज्ञान से स्वयं ही दृष्टा पद में होने का सत्य स्वीकारता है, अस्तित्व दर्शन से सहअस्तित्व को पूर्णतया स्वीकारता है। इस विधि से जीवन का भी दृष्टा-ज्ञाता मानव ही है और अस्तित्व में दृष्टा-ज्ञाता मानव ही है। यह प्रत्येक व्यक्ति में अध्ययन पूर्वक स्वीकृति अवधारणा और अनुभव होने की व्यवस्था है अनुभव मूलक विधि से प्रत्येक व्यक्ति के प्रमाणित होने की व्यवस्था है। यह भी आवर्तनशीलता है। इसी विधि से अनुभवगामी और अनुभवमूलक विधि से प्रत्येक आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्य में सर्वकाल एवं सर्वदेश में समाधान समीकृत होता ही रहता है। इसे भले प्रकार से देखा गया है। अतएव मानवीयतापूर्ण मानव, देवमानव व दिव्यमानव ही हिंसा-अहिंसा के विभाजन रेखा का दृष्टा होना स्वाभाविक है। मानवीयतापूर्ण मानव होने के सत्यापन सहित ही समाधान की ओर हर मानव का गति होना स्वाभाविक है। अतएव आहार, प्रणाली, पद्धति को अपनाने का आधार मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा में से के लिए पशुमानव, राक्षस मानव का प्रवृत्ति आधार नहीं हो पाता है। केवल मानवीयतापूर्ण मानव ही स्पष्टतया आधार हो पाता है।
मानवीयतापूर्ण नजरिये से सम्पूर्ण प्रकार के मांसाहार, हिंसा के सूत्र से सूत्रित हो जाता है। फलस्वरूप मानव मानव के साथ भी हिंसा, द्रोह, विद्रोह, शोषण में लिप्त होना विगत के इतिहास के अनुसार देखा गया है। इस बीसवीं शताब्दी के दसवें दशक तक भी इसी प्रकार की गवाहियाँ देखा गया। समझदारी पूर्वक पता चलता है कि शाकाहारी पशु ओंठ से पानी पीते हैं तथा मांसाहारी पशु जीभ से। इन्हीं के अनुसार दोनों में भिन्न-भिन्न प्रकार के दांत, नाखून बने रहते हैं साथ में यह भी स्पष्ट हो चुका है कि मांसाहारी पशुओं की आँते छोटी और शाकाहारी पशुओं की आँते लम्बी होती है।
शाकाहार सदा ही आवर्तनशीलता, ऊर्जा संतुलन, उर्वरक कार्यों में गुणवत्ता के आधार पर सूत्रित रहता है। कृषि कार्यों के आधार पर पशुपालन, पशुपालन के आधार पर कृषि कार्य में पूरकता स्वाभाविक रूप में देखा गया है। इसी के साथ-साथ मानवकृत वातावरण का संतुलन, नैसर्गिक