संतुलन में भागीदारी भी सहअस्तित्व सहज कार्यकलापों का एक अविभाज्य वैभव रहा है। ये सब पूरक विधि से ही प्रमाणित हो पाता है। हिंसा, शोषण और दोहन विधि से पूरकता, आवर्तनशीलता प्रमाणित नहीं हो पायी है। अतएव मानवीयतापूर्ण परंपरा स्वायत्तता पूरकता व आवर्तनशीलता का संतुलित संगीत विधि से ही समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व को प्रमणित करता है। यह सर्वमानव में स्वीकृत है। इस प्रकार हम मानव प्रतिफल के रूप में कृषि, पशुपालन, ग्राम शिल्प, हस्तकला, कुटीर उद्योग, ग्रामोद्योग और लघु-गुरु उद्योग पूर्वक सामान्याकांक्षा एवं महत्वाकांक्षा सम्बंधी वस्तुओं को श्रम नियोजन और सेवा पूर्वक प्रतिफल के रूप में पा सकते है।

स्वधन का दूसरा भाग पारितोषिक - इसकी परिभाषा ही है प्रसन्नतापूर्वक, प्रसन्नता के लिये प्रदत्त वस्तुएं। ये प्रधानत: उत्सवों के अवसर पर आदान-प्रदान किया जाना मानवीयतापूर्ण मानस के लिये एक आवश्यकता है ही। इस प्रकार प्राप्त धन भी स्वधन में गण्य होता है।

तीसरे प्रकार से स्वधन, पुरस्कार के रूप में प्राप्त धन। मानवीयतापूर्ण परंपरा में श्रेष्ठता का सम्मान होना स्वाभाविक है। श्रेष्ठता का मूल्यांकन मानवीयतापूर्ण परंपरा में व्यवस्था में भागीदारी, स्वायत्त मानव, परिवार मानव और समग्र व्यवस्था में भागीदारी उसकी गति और श्रेष्ठता पुरस्कृत होना स्वाभाविक है। इसी के साथ-साथ स्वास्थ्य-संयम कार्यों में श्रेष्ठता, उत्पादन-कार्यों में श्रेष्ठता, विनिमय-कार्यों में श्रेष्ठता, मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार कार्यों में श्रेष्ठता का मूल्यांकन और पुरस्कार मानव परंपरा में सहज है। इन किसी भी विधाओं का मूल्यांकन और पुरस्कार मानव परंपरा में सहज है। इन किसी भी विधाओं में श्रेष्ठता का सम्मान ग्राम परिवार सभा से विश्व परिवार सभा तक किसी स्तरीय परिवार सभा में श्रेष्ठ व्यक्ति का सम्मान किया जाना मानव परंपरा का ही सम्मान है। इस विधि से प्राप्त वस्तु स्वधन में गण्य होता है।

मानवीयता पूर्ण चरित्र और उसकी गति दयापूर्ण कार्य-व्यवहार में होना पाया जाता है। सम्पूर्ण श्रम शक्ति का नियोजन पूरक विधि से अर्थात् जिस विधा से मानव का श्रम नियोजन होता है अथवा जिस वस्तु पर मानव का श्रम नियोजन होता है उसका संरक्षण होना दयापूर्ण कार्य का तात्पर्य है। हर उत्पादन में सहअस्तित्व विधि से वस्तु व द्रव्यों का सुरक्षा पूर्वक ही प्रतिफल की प्राप्ति और संतुलन का प्रमाण स्वाभाविक रूप में प्रमाणित होता है। दूसरी विधा में मानव-मानव के साथ व्यवहार करता ही है। व्यवहार क्रम में तन-मन-धन रूपी अर्थ का सदुपयोग करना

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