किसी का पोषण, संरक्षण, समाज गति के रूप में सदुपयोग होना प्रमाणित होता है। इस क्रम में यही मानव के साथ दयापूर्ण व्यवहार का तात्पर्य है। यही जीने देकर जीने का प्रमाण है।
नैतिकता - नैतिकता अपने आप में धर्म और राज्य नैतिकता के रूप में देखा जाता है। धर्म शब्द व्यवस्था का मूलवाची है। व्यवस्था की आवश्यकता, अनिवार्यता मानव में, से, के लिये है। मानव अपने में इकाई है इसलिये अखण्ड समाज के अर्थ में व्यवस्था; सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में अखण्ड समाज, संतुलित होता है। सम्पूर्ण नैतिकता का सहज अभिव्यंजना (अभ्युदय के लिये व्यंजित होना) सर्व स्वीकृति के रूप में होता है। समाज की परिभाषा पूर्णता के अर्थ में, पूर्णता के लिये, पूर्णता में, पूर्णता से निष्ठा और उसकी निरंतरता से है। राज्य का तात्पर्य वैभव से है। मानव सहज वैभव समाधान, समृद्धि, अभय और सहअस्तित्व ही है। अस्तु, धर्म अपने मूल रूप में सर्वतोमुखी समाधान है। राज्य अपने मूल रूप में समाधान सहित समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व और उसकी निरन्तरता है। इस प्रकार राज्य और धर्म का मूलरूप प्रत्येक व्यक्ति को समझ में आता है। इन्हीं के प्रतिपादन में नीति को पहचाना जाता है। धर्म और राज्य का प्रतिपादन मानव ही करता है। ऐसा प्रतिपादन करने का समानाधिकार हर नर-नारी में होना पाया जाता है। इसी क्रम में धर्म और राज्य नीति का स्वरूप स्पष्ट होता है। इन्हीं के साथ नियति क्रम सूत्र भी सूत्रित रहता है। नियति अपने स्वरूप में विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति के रूप में दृष्टव्य है। अस्तु, राज्यनीति राज्य का गति रूप होना और धर्मनीति धर्म का गति रूप होना स्वाभाविक है। इसलिये प्रत्येक नर-नारी में अपने ही धारक-वाहकता के रूप में तन, मन (जीवन बल शक्ति) धन रूपी अर्थ का सदुपयोग-सुरक्षा रूपी कार्यकलाप है। इसी क्रम में हर नर-नारी में बल, बुद्धि, रूप, पद, धन धारक-वाहकता के रूप में रहता ही है। यह क्रम से रूप, बल, धन, पद, बुद्धि के रूप में दृष्टव्य है। इसका सदुपयोग, सुरक्षा राज्य और धर्मनीति है। इसका मूल लक्ष्य भी समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व ही है। इन सार्वभौम अर्थ में सदुपयोग-सुरक्षा के फलस्वरूप सुख, शांति, संतोष, आनन्द सहज अनुभव हर नर-नारी में सहज सुलभ होता है। इतना ही नहीं इसकी समीचीनता नित्य वर्तमान है। नैतिकता भी सुखी होने के लिये प्रयोजित होता है। अर्थ सदुपयोग का सुरक्षा ही प्रयोजनों को प्रमाणित कर देता है।
रूप के साथ सच्चरित्रता (शरीर का सदुपयोग विधि) - फलस्वरूप अपने में विश्वास और सुख का अनुभव करना पाया जाता है। वर्तमान में विश्वास होना ही स्वयं व्यवस्था में भागीदारी का