3. सही बात को समझना
(*यह लेख नागराजजी के कथन का श्रोता द्वारा प्रतिलेखन है)
मनुष्य को हमेशा सही बात को समझनी चाहिए। ऐसे चाहत सर्वमानव में विद्यमान है।अगर वह गलत समझेगा तो वह हर मोड़ पर अथवा हर स्थिति पर गलती ही करेगा। जिस तरह एक गणित जब तक सही बात नहीं समझ लेता अथवा अंकित करने का सही तरीका नहीं अपना ले, वह हर अंक गलत ही करेगा। गलत तरीके का उपयोग कर के कोई गणित किसी भी अंक का सही उत्तर नहीं निकाल सकता है।
परन्तु यह सिर्फ गणित का ही प्रश्न नहीं, किसी भी कलाकार, व्यापारी, वकील अथवा गुणी ब्राह्मण के लिये भी यही सिद्धांत लागू होता है। हर मनुष्य एवं व्यक्ति के लिए यह लागू होता है। इस सिद्धांत के लिये कोई नियमित आयु सीमा भी नहीं। चार वर्ष का बालक भी यदि सही तरह से शब्दों का उच्चारण करना नहीं जानता है तो वह उस भाषा की बोली सीख ही नहीं सकता। इस तरह यदि कोई साधु या तपस्वी अपने आप को सही तरह से पूजा-पाठ में लीन नहीं कर सकता वह कभी ईश्वर को प्राप्त कर ही नहीं सकता।
मेरे अनुसार सिर्फ मनुष्य तक ही इस सिद्धांत को नियमित नहीं किया जा सकता। क्या कोई शेर जंगल का राजा होते हुए भी अन्य जानवरों का शिकार कर सकता है यदि वह ऐसा करने का सही तरीका नहीं जानता हो ? अतः सिर्फ मनुष्य ही नहीं हर तरह के पशु-पक्षी, जन्तु-जानवर भी इस तरह के सिद्धांत को अपने साथ लेकर चलते हैं। एक पक्षी यदि अपना घोंसला नहीं बना सकता है तो वह ठण्ड एवं बरसात के मौसम में जी ही नहीं सकता।
एक और बात है। यदि कोई विद्यार्थी अपने पाठ का अध्ययन सही तरह से नहीं समझ लेता वह परीक्षा में पास हो ही नहीं सकता। परन्तु यदि वह एक बार सही पाठ अपने दिमाग अपने दिमाग में जड़ से बैठा ले तो उसका फेल होना असम्भव है। अथवा जीवन में इस बात की यह महता है कि जब तक व्यक्ति सही चीज नहीं जान लेता , वह गलती करता ही रहेगा। जब तक कि उसके मन में सही बात नहीं आ जाती। अतः हर काम करने के लिए ऐसा करने का सही तरीका जानना महत्वपूर्ण ही नहीं आवश्यक है, जरूरी है।
सही चीज को पहचानना भी आवश्यक है। दो और दो चार होता है। तीन और एक भी चार होता है। यदि यह दोनों अंक आपस में जोड़े जाएं तो चार के अलावा और कुछ परिणाम नहीं मिल सकता। इनके अलावा और कोई अंक जोड़कर भी हम सही अंक प्राप्त नहीं कर सकते। यानी "चार (सही) प्राप्त करने के लिये सिर्फ दो ही Formulae सही हैं। एक-तीन और दो-दो। यह ठीक formulae हैं अर्थात् यह हमेशा सही यानी चार (४) ही देंगे। यह मनुष्य के जीवन में भी जरूरी बात है न केवल गणितज्ञ के विषय। अर्थात् सही बात को पहचानना अथवा उसे अपने जीवन में प्रयोग करना जरूरी है ।