मानव
1. मानव जीवन एवं जीवनी-क्रम
मनुष्य का जीवन मानवीयता की सीमा जीवनमूलक पद्धति से आरंभ होता है, चिंतन-समुच्चय भौतिक विचारधारा पर आधारित हो या आध्यात्मिक विचारधारा पर, इस बात को स्पष्ट करने में उत्साह यह प्रकट होता है कि मानव में एक मानवीयता की निश्चित, स्पष्ट एवं अपरिहार्य सीमा को उभारने हेतु सभी सुहृद एवं आप्त पुरुषों का साम्य प्रयास पाया जाता है। इस विषय में उनके द्वारा किया गया यह अथक प्रयास इतिहास के अवलोकन में भी सिद्ध होता है। अब तक उसे प्राप्त करने में हम असमर्थ रहे हैं, फिर भी पाने के लिए प्रत्याशी एवं प्रयासोन्मुख हैं। इस मौलिक बिंदु के संदर्भ में शिक्षा प्रदान करने के लिए मध्यस्थ दर्शन अपने में परिपूर्ण होकर लोक सम्मुख उपस्थित हुआ है, जो 4 भागों में प्रणीत है : यथा
- मानव व्यवहार दर्शन
- मानव कर्म दर्शन
- मानव अभ्यास दर्शन
- मानव अनुभव दर्शन।
मध्यस्थ दर्शन समग्रता, विकास व व्यवहार के प्रति किसी रहस्य द्वंद्व संघर्ष चेतना को मनुष्य के अविकसित चेतना निरूपित करता है साथ ही मानव को गुणात्मक विकास क्रम में मानवीयता पूर्ण संचेतना में संक्रमित होने का निश्चित पद्धति को सुलभ किया है। द्वंद्व को अनुभव व्यव्हार में व समाधान में अध्ययन संस्कार सुलभ करने का पाठ और किसी रहस्य को रहने नहीं देता और साथ ही समग्र के संबंध में यह बताता है कि सत्ता व्यापक है तथा इसमें ही समग्र प्रकृति समाई हुई है, फलतः प्रकृति ऊर्जामय है।
इसलिए प्रकृति प्रत्येक स्तर में क्रियाशील सिद्ध हुई है, चाहे वह बड़े से बड़े गृह गोलादि हो अथवा छोटे से छोटा अणु परमाणु या अंश ही क्यों ना हो। यही वस्तुगत सत्य है। इस सत्यता से चेतना से पदार्थ या पदार्थ से चेतना को निष्पन्न कराने का कष्ट दूर हो गया है। मध्यस्थ दर्शन प्रकृति को जड़ और चैतन्य दो भागों में स्पष्ट करता है। जड़ प्रकृति पदार्थावस्था एवं प्राणावस्था में तथा चैतन्य प्रकृति जीवावस्था एवं ज्ञानावस्था में दृष्टव्य है। ज्ञानावस्था के मनुष्य को परिभाषित करते हुए मानव जनजाति को आत्मनिरीक्षण करने के लिए बाध्य किया गया है। “मनाकार को साकार करने एवं मनः स्वस्थता के आशावादी” को मानव संज्ञा दी गई है। हम देखते हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपनी आशा, इच्छा एवं विचारानुरूप ही प्राकृतिक ऐश्वर्य पर उपयोगिता एवं कला की प्रस्थापना करता है। यही मनाकार को साकार करने का तात्पर्य है। प्रत्येक मनुष्य सुखी होना चाहता है, सुख, शांति, संतोष एवं आनंदित होना चाहता है, जो निर्विवाद सत्य है। यही मनः स्वस्थता के आशावादी का अर्थ है।