व्यवहार

  परिवार व्यवस्था में रहने के साथ-साथ हम एक दूसरे के भावों और व्यक्तित्वों को समझते हैं और उनसे जैसे बर्ताव एवं व्यवहार करते हैं। हम सब एक साथ त्यौहार मनाते हैं और एक दूसरे को वस्तुएँ आदि समर्पण एवं अर्पण करते हैं। समर्पण और अर्पण में अंतर होता है। समर्पण करना उस भेंट को कहते हैं जो हम वापस नहीं चाहते। जो हम एक साथ मनाये गये पर्व, त्यौहार में करते हैं। समर्पण करने के भाव भी शुद्ध एवं स्पष्ट होने चाहिये। सिर्फ देने का एक नियम इसलिये नहीं। बल्कि पूरे दिल से देना चाहिये।

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