व्यवस्था, जिला व्यवस्था, प्रदेश व्यवस्था एवं देश व्यवस्था। सब से छोटा है परिवार व्यवस्था। परिवार व्यवस्था में हम अपने माता-पिता, भाई-बहन के साथ रहते हैं। इस से हम तीन चीज सीखते हैं : 

  • आहार (खाद्य). 
  • व्यवहार (बर्ताव) 
  • विहार

इसका मतलब है एक दूसरे के प्रति मनोभाव | परिवार में रहते हुए हम एक दूसरे के साथ खेलते हैं, हँसते हैं, रोते हैं, बातें करते हैं तो एक दूसरे के प्रति अपने मनोभाव प्रकट करते हैं। भविष्य में इसी से सम्मान बन आता है। 

परन्तु हमें सिर्फ परिवार व्यवस्था तक ही सीमित नही रहना चाहिये। हमें ग्राम, जिला एवं देश के स्तर पर भी विकास की जो योजनाएँ बनाई जा रही हैं उसमें अपना पूरा योगदान देना चाहिये। इस तरह व्यवस्था में रहने से हमारी प्रतिभा और व्यक्तित्व दोनों ही फूलते-फलते हैं। 

आहार 

हर जीव का अपना एक निश्चित आहार होता है। जैसे झाड़-पत्तों के, गाय के लिए घास-फूँस, शेर-बाघ जैसे मांसाहारी जानवरों के लिये अन्य छोटे जानवरों की हत्या की जाती है। 

मनुष्य ने विज्ञान के विषय में बहुत प्रगति किया है, विकासशील हुए हैं। अपने देश को उन्नति के मोड़ पर चढ़ाया है। परन्तु अपना आहार अभी तक कोई decide नहीं कर पाए हैं। कोई शाकाहारी है तो कोई मांसाहारी।

तो यह देखना चाहिये कि मनुष्य/मानव की शरीर रचना कैसी है? इसके लिये पहले हमें मांसाहारी एवं शाकाहारी जानवरों के बीच में अन्तरों का अध्ययन कर लेना चाहिये। मांसाहारी जीवों के दाँत एवं नाखून लम्बे और नुकीले होते हैं ताकि वे मांस को तान-काट सके। 

शाकाहारी जीवों के दाँत - नाखून ऐसे नहीं होते। मांसाहारी जीव हमेशा जीभ से पानी पीते हैं (e.g. कुत्ता)। शाकाहारी जीव होठों से पानी पीते हैं। मांसाहारी जीवों के आंत छोटी होती है, शाकाहारी जीवों की आंत बड़ी होती है। 

अध्ययन किये जाने पर समझा गया है कि मनुष्य में सारे शाकाहरी गुण हैं जहां तक शरीर रचना का सवाल है। मनुष्य के दाँत नाखून लम्बे नहीं होते, आंत बड़ी होती है और वह होठ से पानी पीते हैं। इस कारण साधारणतः मनुष्य को शाकाहरी होना चाहिए। परन्तु मनुष्य अभी तक इसका निर्णय नहीं कर पाया है। 

वैसे देखा जाये तो मनुष्य जितना भी अपने आप को अहिंसा के पथ पर कहे, मांसाहारी मनुष्य हिंसा करता है क्योंकि उसके भोजन के लिये अन्य जीवों की हत्या की जाती है। अतः मांसाहारी मनुष्य हिंसा का द्योतक है ।

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