जिसके लिए पर्याप्त पुष्टियुक्त प्रक्रिया तथा व्यव्हारगम्य होने योग्य रीति को स्पष्ट किया है। मनुष्य को सुखधर्मी प्रतिपादित करते हुए वैचारिक सुख और दुःख तथा व्यावहारिक सुख और दुःख को भी स्पष्ट किया गया है। वैचारिक सुख-दुख का विश्लेषण करते हुए यह बताया गया है कि मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों की दो शृंखलायें हैं। प्रत्येक शृंखला में पाँच पाँच मूल प्रवृत्तियों का उल्लेख है। प्रथम शृंखला में पायी जाने वाली मूल प्रवृत्तियों से सुख परिपाक दूसरी से दुख परिपाक के क्रम नियम को उद्घाटित किया है जो मनोविज्ञान के संदर्भ में पूर्णता की ओर प्रेरणादायी स्रोत है। दुःख परिपाकात्मक शृंखला में संग्रह, द्वेष, अज्ञान, अभिमान तथा भय की प्रवृत्तियों को बताया गया है। इन प्रवृत्तियों के मूल में जितने भी विचार हैं, वे सब भय जन्य हैं अर्थात् भयादि में, से, के लिए ही इन विचारों का उद्गम है। इसी प्रकार सुख परिपाकात्मक शृंखला में असंग्रह, स्नेह, विद्या, (निर्भ्रम ज्ञान) सरलता एवं अभयता को बताया है। इन्हें ही वैचारिक सुख और दुःख का कारण प्रतिपादित करते हुए पर्याप्त पुष्टियुक्त प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं। 

मध्यस्थ दर्शन की यह भी प्रस्थापना है कि काम और क्रोध दोनों आवेशी तत्व हैं। आवेश के लिए विदेशी शक्ति या तत्व का आक्रमण या प्रहार आवश्यक है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कामुकता पर आधारित मूल प्रवृत्ति एवं उसी के आश्रित संवेगों को बताने वाले मनोवैज्ञानिकों की गहराई कितनी है। मध्यस्थ दर्शन का यह दावा है कि अग्रमिता के लिए प्रयुक्त वैचारिक शक्तियाँ ही प्रवृत्तियाँ हैं। अग्रिमता विकास के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हो सकती। मनुष्य की प्रवृत्तियाँ ही स्वयं में जीवन की गति हैं। प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में जैसा और जितना ऊपर बताया गया है उससे अन्यथा नहीं पाया जा रहा है। कम ज्ञान के अभाव में अध्ययन पूर्ण नहीं हुआ रहता है। मनुष्य जीवन की अग्रिमता के विषय में बताया गया है कि अमानवीयता से मानवीयता, मानवीयता से अतिमानवीयता ही अग्रिम विकास है।

दूसरी पद्धति से यह भी स्पष्ट किया गया है कि पशु मानव से राक्षस मानव, राक्षस मानव से मानव, मानव से देव मानव तथा देव मानव से दिव्य मानव विकासपूर्ण है। इसके लिए व्यक्ति की सीमा में आचरण हेतु, परिवार की सीमा में आचरण के सहयोग की निरंतरता हेतु, समाज की सीमा में उसके प्रोत्साहन योग्य प्रकाशन, प्रचार एवं प्रदर्शन कार्य हेतु, राष्ट्र की सीमा में उसके संरक्षण एवम् संवर्धन योग्य विधि, व्यवस्था एवम् शिक्षा प्रणाली हेतु तथा अंतर्राष्ट्रीय सीमा में उसके अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण हेतु योग्य कार्यक्रम को मध्यस्थ दर्शन में प्रस्थापित किया है। समग्र मनुष्य के प्रति कार्यक्रम को प्रस्तावित करते हुए उस सहस्तित्ववाद मौलिक तथ्य को प्रस्थापित किया है जो अनुपम अभिनव एवम् अनिवार्यतम सिद्ध होता है।

ऊपर बताया गया है कि मनुष्य का ऐसा कोई क्रियाकपाल नहीं है जो आर्थिक, राजनैतिक एवं धर्मनैतिक सीमाओं से संबद्ध न हो। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि अंततोगत्वा प्रत्येक कार्य एवम् कार्यक्रम का व्यक्ति की सीमा में तृप्ति-प्रदायी होना अनिवार्य है, क्योंकि व्यक्ति की सीमा में ही आचरण होता है तथा आचरण ही व्यक्तित्व, प्रतिभा तथा कार्यशीलता की क्षमता को प्रकट करता है जो शिक्षा और व्यवस्था का प्रत्यक्ष रूप है। ऐसे आचरण से प्रत्येक व्यक्ति समृद्धि, सहअस्तित्व, समाधान एवम् आनंद का अनुभव करना चाहता है। इसी क्रम से मनुष्य के व्यवसाय, व्यवहार, विचार एवम् अनुभूति इन चारों आयामों की उपलब्धियाँ एवम् तृप्तियाँ हैं। इन स्पष्ट आयामों सहित संपूर्ण स्तरों में एक सूत्रात्मक कार्यक्रम को निर्धारित करने के हेतु मानवीयता की सीमा को स्पष्ट कर दिया गया है। अमानवीयता की सीमा में समाजिकता की असंभावनाओं को प्रतिपादित करते हुए यह दर्शन मानवीयता की सीमा में ही अखंड सामाजिकता की संभावना बताते हुए उसके उपयुक्त कार्यक्रम को निधारित करता है। मनुष्य की भौतिक

Page 41 of 106
37 38 39 40 41 42 43 44 45