6. मध्यस्थ दर्शन (क्र. ६)
सत्ता मध्यस्थ है - व्यापक है। प्रकृति सम-विषम और मध्यस्थ क्रिया है, सीमित है। इसलिए सत्ता स्थिति पूर्ण है।
प्रकृति स्थिति शील है इसलिए सत्ता में प्रकृति समाई हुई है। अतः सत्ता में प्रकृति ओत-प्रोत है। अस्तु सत्ता में प्रकृति संपृक्त है। इसलिए ही प्रकृति पूर्णतया ऊर्जामय है। अस्तु प्रकृति क्रियाशील है। अतः प्रकृति श्रम, गति एवं परिणाम के लिए बाध्य है। फलस्वरूप प्रकृति ही चार अवस्थाओं में प्रत्यक्ष है। इसलिए सत्ता में प्रेरित प्रकृति उसका अनुभव करने की क्षमता, योग्यता एवं पात्रता से सम्पन्न होने पर्यंत विकासशील है। फलतः परिणाम का अमरत्व (अंतिम परिणति), श्रम का विश्राम एवं गति का गंतव्य, वस्तुस्थिति, वस्तुगत एवं स्थिति सत्य के रूप में प्रत्यक्ष है।
सत्ता मध्यस्थ है। इसलिए मध्यस्थ सत्ता में संपृक्त प्रकृति नियंत्रित एवं संरक्षित है। प्रत्येक परमाणु में पाया जाने वाला मध्यांश (नाभिक) मध्यस्थ क्रिया है। इसलिए सम-विषमात्मक क्रियाएँ एवं सापेक्ष शक्तियाँ नियंत्रित व संरक्षित है।
अनंत क्रिया अथवा क्रिया समूह ही प्रकृति है, जो जड़ और चैतन्य के रूप में गण्य है। जड़ प्रकृति ही विकासपूर्वक चैतन्य पद को पाती है। मनुष्य जड़ और चैतन्य का संयुक्त रूप है। साथ ही प्रकृति का अंश भी है।
विकास के क्रम में गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता एवं आचारणपूर्णता है।
मनुष्य कम विकसित प्रकृति के साथ व्यवसायपूर्वक उपयोग, उपभोग, शोषण एवं पोषण करता है। मनुष्य-मनुष्य के साथ व्यवहार, अधिक विकसित के साथ गौरव करने के लिए बाध्य है, अधिक विकास के लिए अभ्यास करता है।
“मनुष्य ही कर्म करते समय स्वतंत्र, फल भोगते समय परतंत्र है।”
इस पृथ्वी पर मानव अधिक विकसित है। उसे विकासपूर्ण होने का अवसर, वांछा एवं संभावना प्राप्त है। अधिक विकसित होने के कारण कम विकसित का सहायक होना उसका प्रधान लक्षण है।
पदार्थावस्था से प्राणावस्था विकसित, प्राणावस्था से जीवावस्था विकसित तथा जीवावस्था से भ्रांत ज्ञानावस्था का पशुमानव विकसित। भ्रांत ज्ञानावस्था के पशु मानव से भ्रांत राक्षस मानव विकसित, भ्रांत राक्षस मानव से भ्रांताभ्रांत मनुष्य विकसित तथा भ्रांताभ्रांत मानव से निर्भ्रांत देव मानव विकसित है। निर्भ्रांत देवमानव से दिव्यमानव विकासपूर्ण है।
ज्ञानावस्था की इकाई दर्शन करती है। दर्शन, जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के संदर्भ में है। सत्ता में ज्ञान होता है। निर्भ्रम अवस्था में ही ज्ञान व दर्शन पूर्ण होते है। इसलिए निर्भ्रमता ही प्रबुद्धता, प्रबुद्धता ही प्रभुता, प्रभुता ही सत्ता। सत्ता ही नियम, न्याय, धर्म एवं सत्य है। यही मध्यस्थ एवं सत्ता है।
“मनुष्य ही मनुष्य के ह्रास व विकास में प्रधानतः सहायक है।”