आवेश, आक्रोश, उद्विगनता अथवा असंतुलन अनुभव में अति हैं। उनके मूल में ग़लती का होना आवश्यक है। इस संबंध में मध्यस्थ दर्शन ने इस वस्तुगत सत्य को भी निरूपित किया है कि किसी एक लक्ष्य की अपेक्षा में ही हम सही ग़लत का निर्णय करते हैं और इस लक्ष्य के संदर्भ में जड़-चैतान्यात्मक प्रकृति की सीमा में लक्ष्य को विकास की ओर इंगित किया है। विकसित होने का तात्पर्य समाधनित होने से है। अतः विकसित हो जाना ही जड़-चैतान्यात्मक प्रकृति का लक्ष्य है। यही उसका नियति क्रम है। इस प्रकार हमारा लक्ष्य अग्रिम विकास ही रह जाता है और इसी के आधार पर विधि और निषेध का निर्धारण होता है। मानवीयता की अपेक्षा में अमानवीयता गलती या निषेध है। इसी शृंखला में अतिमानवीयता की अपेक्षा में मानवीयता अनावश्यक एवं नगण्य हो जाती है। इस प्रस्तावना के आधार पर विधि-निषेध, आवश्यक-अनावश्यक, उचित-अनुचित, वांछनीय-अवांछनीय, सदुपयोग-दुरुपयोग आदि समस्याओं का समाधान उपलब्ध हो जाता है।

मध्यस्थ दर्शन यह प्रतिपादित करता है कि जड़ -चैतन्यात्मक प्रकृति का लक्ष्य तीन स्तरों में पूर्ण होता है जो वस्तुगत तथा वस्तुस्थिति है। प्रत्येक इकाई में पाए जाने वाले श्रम, गति तथा परिणाम को जो देखा जाता है, उनमें से परिणाम अमरत्व के स्तर पर इकाई में प्रत्यक्ष होता है। अमरत्व का तात्पर्य रासायनिक द्वंदो से मुक्त हो जाना। ऐसी इकाइयाँ अर्थात् परमाणु गठन की पूर्णता को प्राप्त कर चैतन्य हो जाती है। चैतन्य हो जाने के अनंतर ही अग्रिम विकास की श्रृंखला में सतर्कता एवं सजगता को पा लेता है। मध्यस्थ दर्शन ने विकास की इन तीन स्थितियों को लोकग़म्य बना दिया है क्योंकि यह एक वस्तुस्थिति सत्य है। स्थिति में जो भी है उसी को सत्य की संज्ञा से मध्यस्थ दर्शन ने इंगित किया है। इस प्रकार विकास के क्रम में पहली मंज़िल अमरता को, दूसरी सतर्कता को, तथा तीसरी सजगता को बताया गया है।

अमरत्व तो गठन की पूर्णता के साथ ही सिद्ध हो जाता है। परंतु सतर्कता की पूर्णता मानवीयता की सीमा में ही सिद्ध होती है। इसके साक्षी-स्वरूप यह प्रमाण दिया गया है कि मनुष्य में भी मानवीयतापूर्ण जीवन की स्थापना पर्यंत भय का अभाव नहीं है। भय से मुक्ति पाने के लिए ही हम सतर्कता को बर्तते हैं, जो सामान्यतः दिखाई देने वाला तथ्य है। यही क्रिया की पूर्णता का द्योतक है अथवा प्रमाण है। इस स्थिति को पाने तक मनुष्य स्वतंत्र नहीं है। मानवीयता से परिपूर्ण हो जाने के उपरांत ही व्यक्ति सामाजिकता के सीमा में स्वतंत्र होता है और फलतः उसके अग्रिम विकास की आवश्यकता की उत्पत्ति हो जाती है जिसके कारण वह आगे विकसित होने के लिए बाध्य हो जाता है। मानवीयता से विकसित होकर अतिमानवीयता से परिपूर्ण होने तक मनुष्य अभ्यास करता रहता है। इस प्रकार सहअस्तित्ववादी दर्शन ने क्रिया की पूर्णता की सीमा को अपेक्षाकृत विकसित के रूप में उद्घाटित करते हुए आचरणपूर्णता को स्व-सापेक्ष बताया है इसके प्रमाण में यह बताया गया है कि प्रत्येक इकाई में पाया जाने वाला स्वभाव ही आचरण के रूप में प्रकट होता है। इस प्रकार मध्यस्थ दर्शन ने स्वतंत्रता की सीमा को स्पष्ट करते हुए मानव मात्र को सचेत कर दिया है।

मध्यस्थ दर्शन ने व्यक्ति के आचरण को मानवीयता की सीमा में ही आर्थिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधानपूर्वक सुलभ होने की सत्यता को प्रतिपादित किया है, जिसका एक स्वस्थ परंपरा होने की अनिवार्यता व संभावना को स्पष्ट किया है। मानव द्वारा निपुणता एवं कुशलतापूर्वक पद्धति से भौतिक समृद्धि को पाने का, न्यायपूर्ण व्यवहार से अखंड सामाजिकता को पाने का तथा धर्मपूर्ण विचार से बौद्धिक समाधान को पाने का दावा मध्यस्थ दर्शन ने किया है,

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