और सम्भवतः भौतिक विज्ञान भी इसी की पुष्टि करता है। मध्यस्थ क्रिया है इसलिए मध्यस्थ शक्ति है और इसीलिए ही सम और विषम का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। सामान्यतः हम यह भी देखते हैं कि दुर्बल, बलवान के सामने निशप्रभावी हो ही जाता है अथवा दुर्बल बलवान पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। यह एक सर्वविदित तथ्य है। इसी प्रकार मध्यस्थ क्रिया पर अर्थात् मध्यान्श पर उसके आश्रितांश के सम और विषम का उस पर प्रभाव न पड़ने का प्रमाण स्वयं में यह सिद्ध कर देता है कि मध्यस्थ क्रिया सम और विषम क्रिया की अपेक्षा में अत्यंत बलशाली है।
इकाई अर्थात् परमाणु के इन्हीं तथ्यों के आधार पर मनुष्य के जीवन के कार्यक्रम में मध्यस्थता का अनुसरण ही वस्तुगत सत्य तथा वस्तुस्थिति के सत्य के संदर्भ में किये गए अध्ययन का प्रधान लक्षण है। इस परिप्रेक्ष्य में अनेकानेक पद्धतियों से पुष्टि सहित विश्लेषण करते हुए मध्यस्थ दर्शन मनुष्य जीवन के कार्यक्रम के संदर्भ में सुस्पष्ट एवं सुदृढ़ आधार रूप मानव जीवन के (१) व्यवसाय (२) व्यवहार (३) विचार तथा अनुभव - इन चार आयामों को स्पष्ट करता है। इन चार आयामों से कम में कोई मनुष्य नहीं है। साथ ही मनुष्य में इससे अधिक भी न होने का दावा यह दर्शन करता है। इसका उद्घोष है कि इन चारों आयामों में किसी एक की भी पुष्टि न होने अथवा इन आयामों की प्राप्ति न होने की स्थिति में ही मनुष्य जीवन के असंतुलित होने की संभावना है। इस प्रकार व्यक्ति के स्तर में चारों आयामों को तृप्त करने योग्य तथा समग्र मानव की - व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं अंतरराष्ट्र इन पाँच स्तरों में गणना करते हुए मध्यस्थ दर्शन ने एक स्पष्ट कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। व्यक्ति का आचरण मानवीयता से परिपूर्ण होने से ही समृद्धि एवं समाधानपूर्ण होने, परिवार को उसके सहयोग योग्य, समाज को उसके प्रोत्साहन योग्य, राष्ट्र को उसके संरक्षण योग्य तथा अंतराष्ट्र को उसके अनूकूल परिस्थितियों के निर्माण योग्य बनाने के लिए योग्य कार्यक्रम प्रस्तुत करना ही मध्यस्थ दर्शन का उद्देश्य है। एक व्यक्ति की सीमा में उसके आचरण को अमानवीयता, मानवीयता एवं अतिमानवीयता के रूप में उसका स्पष्ट विश्लेषण है।
सुदूर विगत से हम मनुष्य के परिभाषीकरण तथा मानवीयता के समीकरण के विषय में जिज्ञासु रहे हैं जिसकी आवश्यकता हमें अभी भी प्रतीत हो रही है। इसे पाने हेतु अनेक प्रयास किए गए परंतु वह अब तक उपलब्ध नहीं थी। इसके प्रमाण में सर्वेक्षण द्वारा मध्यस्थ दर्शन प्रकट करता है कि वर्तमान कार्यक्रम की क्रम शृंखला की परिणति वर्ग का रूप धारण करने में होती है। वर्ग की परिभाषा अपने आप में स्पष्ट है। वर्ग भावना में एक समुदाय की अपेक्षा में दूसरे समुदाय में श्रेष्ठ या नेष्ट, योग्य या अयोग्य की भावनाओं का रहना आवश्यक है।यही सविषम या परस्परता में विषम मूल्य अथवा मूल्य का आरोप वर्ग भावना अर्थात् वर्ग के प्रतिमूल्यों को सुरक्षित करने के लिए कटिबद्ध हो जाता है। फलतः संघर्ष होता है, जिसकी परिणति युद्ध में होती है। मध्यस्थ दर्शन का यह सिद्धांत है कि ‘मानव सही में एक और गलती में अनेक है’। हमें निश्चित दिशा में सोचने के लिए बाध्य करता है। इसकी पुष्टि में मध्यस्थ दर्शन ने प्रमाण प्रस्तुत किया है की यदि किसी गणित के प्रश्न का उत्तर सही होता है तो कितने भी लोग उस प्रश्न का उत्तर देने में भाग लें उनका उत्तर एक ही होगा। पर यदि उत्तर ग़लत है तो प्रत्येक व्यक्ति के अपने अपने ढंग से गलती करने से अनेक उत्तर हो सकते हैं।
अतः व्यक्ति परिवार दो गुट अथवा दो समूह के पारस्परिक वाद विवाद में स्पष्ट स्थिति यह होती है कि या तो एक पक्ष ग़लत हो अथवा दोनों पक्ष गलती में हों। दोनों सही हों और वाद विवाद हो जाए ऐसा सम्भव नहीं अथवा इसका प्रमाण नहीं है। इस तथ्योद्घाटन से हमें यह ज्ञात हो जाता है कि जितने भी वाद विवाद, आलोचना, प्रत्यालोचना,