मध्यस्थ दर्शन

  • मध्यस्थ दर्शन सत्ता में संपृक्त प्रकृति के परिणाम में अमरत्व, श्रम के विश्राम एवं गति के गंतव्य का निर्भ्रम रूप में विधिवत बोध सुलभ कराता है । 
  • उसकी (प्रकृति) विधिवत प्रक्रिया के आनुषंगिक प्रकृति का विषम एवं इतिहास स्पष्ट होता है। 
  • प्रकृति के विकास एवं इतिहास के तारतम्य में स्पष्टीकरण यह है कि – 

मानव की परिभाषा

मानवीयता की व्याख्या, मानव जीवन का कार्यक्रम, मनुष्य के चारों आयाम (व्यवसाय, व्यवहार, विचार एवं अनुभूति), जीवन की पांचों स्थितियाँ (व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं अंतर्राष्ट्र) में सार्वभौमिक रूप में इनकी सीमा, कर्त्तव्य एवं दायित्व निर्धारित होता है। यही सामाजिक अर्थ-व्यवस्था को प्रस्तावित करता है जो स्वयं में विधि एवं व्यवस्था है। इसी के फलस्वरूप मानव, मानवीय संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्ध होता है। फलतः -

  • प्रत्येक व्यक्ति मानवीयता की सीमा में आचरण करने, अतिमानवीयता की ओर प्रयास करने के लिए बाध्य होता है।
  • प्रत्येक परिवार मानवीयता की सीमा में सहयोगी बनने, समाज मानवीयता की सीमा में प्रोत्साहन एवं उत्साह प्रदान करने, प्रत्येक राष्ट्र मानवीयता की सीमा में संरक्षण एवं संवर्धन करने तथा अंतर्राष्ट्र मानवीयता की सीमा में उसके अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करने के लिए बाध्य होता है।     

कृतज्ञता 

उन सभी सुपथ प्रदर्शकों के प्रति मैं कृतज्ञ हूँ, जिससे आज भी यथार्थता के स्त्रोत जीवित हैं। कृतज्ञता विकास की ओर प्रगति के लिए मौलिक मूल्य है। कृतज्ञता ही मूलतः संस्कृति व सभ्यता का आधारग्राही व संरक्षक मूल्य है। 

जो कृतज्ञ नहीं है वह संस्कृति व सभ्यता का वाहक बनने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकता। जो संस्कृति व सभ्यता का वहन नहीं करेगा वह विधि एवं व्यवस्था का पालन नहीं करेगा। 

संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था परस्पर पूरक हैं। इनके बिना समाज तथा सामाजिकता का निर्धारण संभव नहीं है। अस्तु कृतज्ञता के बिना गौरव, गौरव के बिना सरलता, सरलता के बिना सहअस्तित्व, सहअस्तित्व के बिना कृतज्ञता की निरन्तरता नहीं है।

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