समृद्धि के संदर्भ में अधिक उत्पादन व कम उपभोग करने की क्षमता एवम् संयमता को जन सामान्य में होने की संभावना बतायी गई है। व्यवसाय मूल्यों के निर्धारण के परिपेक्ष्य में यह दर्शन प्राकृतिक ऐश्वर्य पर प्रस्थापित करने वाली उपयोगिता एवं सुन्दरता के सुदृढ़ आधार श्रम नियोजन के आनुपातिक क्रम से प्रत्येक उत्पादित वस्तुओं का अपेक्षाकृत मूल्य निर्धारणपूर्वक श्रम विनिमय पद्धति की अनिवार्यता व संभावना को स्पष्ट किया है, उद्घाटित करता है। इस सुदृढ़ आधार पर मूल्यों के निर्धारण के असंदिग्ध रूप में निर्णित होने की संभावना उत्पन्न हो जाती है। इन मौलिक आधारों पर एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था उन्नयन संभव हो गया है।
मूल पूँजी श्रम के संदर्भ में मध्यस्थ दर्शन निपुणता, कुशलता एवं पांडित्य की वस्तुगत सत्यता की ओर ध्यान को आकर्षित करता है। श्रम नियोजन के प्रतिफल, जिसे मज़दूरी कहा जाता है, के निर्धारण के संदर्भ में उसे उत्पादन कार्य क्षमता हस्त लाघव आवश्यकता, साधन संभावना व समय पर उत्पादन की तादात पर आंके जाने का एक निरबाद तथ्यपूर्ण मार्ग प्रशस्त कर देता है जिससे मज़दूर और मज़दूरी के मध्य में पाये जाने वाले असंतोष, अत्याशा एवं शोषण के स्थान पर निर्णयात्मक संतुष्टि, संयम व नियंत्रण पाने का स्वस्थ मार्ग प्रशस्त हुआ है जो प्रत्येक स्तर में व्यावहारिक एवम् अनिवार्यतम है। जिस पद्धति को प्रत्येक व्यक्ति में स्वमूल्यांकन योग्य क्षमता को शिक्षा व शिक्षण द्वारा स्थापित करने और उनमें अधिक उत्पादन कम उपभोग योग्य अधिकार निर्माण करने की नीतियों पर आधारित किया गया है। अस्तु यह एक अवसर है हम मध्यस्थ दर्शन सहस्तित्ववाद को अध्ययन अवगाहन एवं हृदयंगम करें और विकल्प को पाकर स्वर्गीयता का अनुभव करें।