4. मध्यस्थ दर्शन (क्र. ४)
मध्यस्थ दर्शन ( सहअस्तित्ववाद) अस्तित्व में अनुभव की ही अभिव्यक्ति, सम्प्रेषणा व प्रकाशन है। यह दर्शन अथ से इति तक प्रामाणिक व व्यावहारिक है। यह दर्शन स्वयं प्रयोग व्यवहार और अनुभवात्मक प्रमाणों की कसौटी से निकला हुआ है इसलिए निर्विवाद है ।
यह दर्शन मध्यस्थ सत्ता (साम्य ऊर्जा), मध्यस्थ क्रिया (परमाणु की मध्यांश क्रिया) मध्यस्थ जीवन (जागृतिपूर्ण जीवन) अथवा स्वानुशासित जीवन प्रतिपादित किया है जो अनुभव व व्यवहारगम्य है। इसे संप्रेषणा के क्रम में समाधानात्मक भौतिकवाद के नाम से जाना जाता है। जिसमें श्रम नियोजन व श्रम विनिमय सिद्धांत प्रधान है। प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम नियोजन पूर्वक ही वस्तु मूल्यों को उपयोगिता व प्रयोजनीयता के आधार पर मूल्यांकन करने की व्यवस्था प्रदान की गई है, जिसमें संग्रह व अपव्यय दोनों ही नहीं होगा, इसलिए इसके व्यवहार रूप को आवर्तनशील अर्थचिंतन कहा है जो समाधानात्मक भौतिकवाद का शास्त्र रूप है।
व्यवहारात्मक जन चेतना जो मानवीय आचार संहिता के रूप में स्पष्ट है, औसद मनुष्य का आधार प्रदान करता है फलतः वर्ग, समुदाय एवं संप्रदाय आदि दीवालें समाप्त होकर स्वच्छंद मानव-सहज एवं मानवीयता सहित जीने की कला को प्रत्येक मनुष्य व्यक्त करने का प्रावधान है, फलतः स्वराज्य एवं स्वतंत्रता को अनुभव करने की व्यवस्था है, जो व्यवहारात्मक जनवाद का शास्त्र रूप है ।
अनुभवात्मक अध्यात्मवाद - अस्तित्व में मनुष्य की जीवन जागृतिपूर्वक सत्य (साम्य ऊर्जा) में अनुभूत होना बोधगम्य करा दिया है, यह सबको बोध होता भी है। अनुभव केवल सत्य में ही होना व्याख्यायित एवम् परिभाषित है, जो प्रत्येक मनुष्य को अनुभवगम्य है। इसके शास्त्र रूप को शैक्षणिक धरातल पर मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान के रूप में स्पष्ट किया है।