5. मध्यस्थ दर्शन (क्र. ५)
मध्यस्थ दर्शन ने मनुष्य में वस्तुगत सत्य के रूप में पाए जाने वाले व्यवसाय, व्यवहार, विचार एवं अनुभूति - इन चार आयामों को स्पष्ट किया हैl इन सभी आयामों की तृप्ति हेतु मनुष्य जीवन के कार्यक्रम की आवश्यकता एवं अनिवार्यता है। इस संदर्भ में साधार पद्धति से इस निर्णय को प्रतिपादित किया गया है कि व्यवसाय का व्यावहारिक तृप्ति के लिए, व्यवहार का वैचारिक तृप्ति के लिए तथा विचार का अनुभव की तृप्ति के लिए नियोजन ही जीवन के कार्यक्रम का प्रत्यक्ष फल है। इस तथ्य का उद्घाटन धर्मनीति तथा राजनीति एवं उनके पक्षधरों को सूक्ष्म निरीक्षण हेतु बाध्य करता है और साथ ही निर्विवाद कार्यक्रम के लिए प्रेरित करता है।
उत्प्रेरित राजनैतिक एवं धर्मनैतिक संस्थाओं में अथवा राजनीति एवं धर्मनीति की पद्धतियों ने अपनी विशिष्टता से प्रतिष्ठित वैविध्यता सहित विपरीत अर्थात् परस्पर विपरीत पद्धति से जितने भी प्रयोग किए ये सारे प्रयोग असफलता के कगार पर वर्तमान बिंदु में उपस्थित हो गए हैं। वर्तमान समय में कोई भी ऐसी धर्मनैतिक या राजनैतिक संस्था नहीं है जो झेलने के अलावा अपने को सफल बनाने के साहस को संजोये हुए हो अथवा सफलता के प्रमाण प्रस्तुत कर सकती हो। इतने वृहद् पैमाने के परामय सशंकता एवं भय की छाया में अपने संकीर्ण तथा संकीर्णतम दायरे में जनबल एवं युद्ध सामग्री के बल पर अपने को सुरक्षित करने की तैयारियों में संलग्न मानव जाति को इस विश्वव्यापी संकट से उबारने हेतु मध्यस्थ दर्शन। सहअस्तित्ववाद उदय हो गया है।
एक ऐसी मूल प्रस्तावना को जो वस्तुगत सत्यता के रूप में है, उद्घाटित कर सभी अज्ञ-विज्ञ को बोधगम्य बनाकर निश्चित परिमार्जित नियम एवं प्रक्रिया संबद्ध संभावना एवं आशा का निर्माण मध्यस्थ दर्शन करता है, यह विस्मयकारी प्रक्रिया है ‘मध्यस्थ सत्ता’, ‘मध्यस्थ क्रिया’ एवं ‘मध्यस्थ जीवन’ दर्शन की प्रस्थापना है कि यह मध्यस्थ क्रिया ही समविषम दोनों को नियंत्रित करती है। इस संदर्भ में हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि सम क्रिया एवं विषम क्रिया दोनों आवेशित होना पाया जाता है। इन दोनों क्रियाओं को नियंत्रित करने वाली तीसरी क्रिया के न होने की स्थिति में सम या विषम को आवेशित होने के अनंतर पुनः आवेशित ही होना था, परंतु इसके विपरीत हम प्रत्यक्ष में सम-आवेश व विषमातिरेक अथवा विषम आवेश दोनों को सामान्य होता हुआ देखते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इसे सामान्य बनाने वाली - आत्मसात् करने वाली, नियंत्रित करने वाली कोई तीसरी क्रिया है ही।
इस परिप्रेक्ष्य को स्पष्ट करते हुए मध्यस्थ दर्शन एक इकाई में अर्थात् एक परमाणु में सम-विषम-मध्यस्थ इन तीनों क्रियाओं के सम्मिलित रूप में रहने की सत्यता को स्पष्ट करता है, जिसके प्रभाव में इकाई को गठनपूर्वक इकाई बताया है। एक गठन के लिए एक से अधिक अंशों का रहना भी आवश्यक बताया है। इस निर्विवाद तथ्य के आनुषंगिक प्रत्येक गठन के मध्य में स्थित अंश को मध्यान्श की संज्ञा प्रदान करते हुए उसी अंश की जो क्रिया है उसे ही मध्यस्थ क्रिया बताया गया है तथा उसी के सभी ओर घूमने वाले जितने भी अंश हैं उन्हें सम या विषम क्रिया की संज्ञा से निरूपित किया है, जिसका अध्ययन भौतिक एवं रसायन शास्त्र भली प्रकार से करा देता है। वर्तमान में इस संदर्भ में जो शिक्षा उपलब्ध है तथा उसमें सम और विषम का जो ज्ञान कराया जा रहा है उसे मध्यस्थ दर्शन स्वीकार करता है। अतएव इस दर्शन से सम-विषम क्रियाओं की विशद चर्चा न करते हुए मध्यस्थ क्रिया एवं उसकी गरिमा पर ही विषद रूप में अपनी चर्चा को केंद्रित किया है। उसका यह दावा है कि मध्यस्थ क्रिया पर सम विषम का प्रभाव नहीं पड़ता