7. मध्यस्थ दर्शन (क्र. ७): ‘चैतन्य प्रकृति का रहस्य उद्घाटन’
चैतन्य के संबंध में अनेकानेक कल्पनाएं की गई हैं। भौतिकवादियों ने रासायनिक प्रक्रिया की सीमा में ही चैतन्य पक्ष को स्पष्ट करने का प्रयास किया। उनके अनुसार मेधस से ही सभी कार्य संपन्न होता है, या मेधस ही चैतन्य क्रियाकलापों को संपन्न करता है, अर्थात् मेधस ही चैतन्य है। इस संदर्भ में ‘मध्यस्थ दर्शन’ एक अभूतपूर्व प्रस्थापना प्रस्तुत करता है जो सार्वभौमिक रूप में प्रेरणादायी है। उसने चैतन्य को क्रिया बताया है। वास्तव में तो शायद भौतिकवादियों की भी यही मंशा, मान्यता है परंतु मध्यस्थ दर्शन ने इस क्रिया को गठनपूर्णता से संपन्न परमाणु बताया है जबकि मेधस अनेक अंशों का उसका संयुक्त रचना है। मध्यस्थ दर्शन प्रतिपादित करता है कि प्रत्येक परमाणु गठनपूर्वक परमाणु है। प्रत्येक गठन में एक से अधिक अंशों का रहना आवश्यक है। अंश और गठन से तात्पर्य है, जिसमें आकार आयतन एवं घनता का प्रकटन है। क्रिया के संदर्भ में स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि जिसमें गति और संवेदना संकेत ग्राही व प्रसारण क्षमता हो, ऐसी अनंत क्रिया समूह ही प्रकृति है। संपूर्ण प्रकृति सत्ता में समाई हुई है, फलतः सत्ता में संपृक्त है। इसलिए सत्ता को प्रकृति का मूल आधार बताते हुए प्रकृति एवं सत्ता के सहअस्तित्व को भी बताया गया है। मध्यस्थ दर्शन का दावा है कि प्रकृति एवं सत्ता को अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि सत्ताविहीन स्थान नहीं है। फलतः प्रकृति को अविरत क्रियाशील बताया गया है।
मध्यस्थ दर्शन ने परमाणु के गठन के संदर्भ में बताया है कि प्रत्येक गठन में मध्य भाग है तथा उस मध्य भाग में अवस्थित अंश को मध्यांश की संज्ञा से इंगित कराया गया है। मध्यांश के सभी ओर एक या एक से अधिक परिवेश में एक या एक से अधिक अंश वर्तुलाकार में मध्यांश का चक्कर लगाने में क्रियाशील रहते हैं। इन परमाणुओं में पाए जाने वाले अंशों की स्वतंत्र गति नहीं होती है। इसके साक्षी स्वरूप बताया गया है कि किसी भी गठन में निहित अंश तब तक उस गठन की सीमा से अलग नहीं हो सकता, जब तक वह दूसरे किसी से क्षुब्ध नहीं हो जाता। क्षुब्ध होने के बाद, चाहे परमाणु हो या अंश वह अस्वाभाविक गति को प्राप्त करता है। इस अस्वाभाविक गति को शक्ति के नाम से गणना की गई है। यही सापेक्ष शक्तियां हैं।
इसी तारतम्य में आगे यह स्पष्ट किया गया है कि परमाणु, अपने में जितने अंश समा जाने की संभावना रखता है, उन सभी के समा लेने के बाद रासायनिक क्रिया अर्थात् प्रस्थापन विस्थापन घटना क्रम से मुक्त हो जाता है। यही गठन की पूर्णता है जो उसे चैतन्य पद प्रतिष्ठा प्रदान करती है। इस कारणवश उसमें जो वर्तुलात्मक गति रहती है उसकी अपेक्षा में कम्पन्नात्मक गति अधिक हो जाती है और फलस्वरुप तत्काल ही आशा का प्रकटन आरंभ हो जाता है। यही चैतन्य परमाणु अपनी लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई से अधिक स्थान में संयत रूप से कार्यरत होता है और फलतः एक पुंजाकार में अवस्थित होता है। प्रत्येक पुंजाकार किसी न किसी जीव का आकार होता है। उस आकार के मेधसयुक्त जीव शरीर को वह पुंजाकार में अवस्थित चैतन्य परमाणु अपनी आशानुरूप संचालित करता है। जब तक वह जड़ शरीर संचालन योग्य यंत्र बना रहता है, तब तक वह चैतन्य परमाणु उसे संचालित करता है, उसके बाद उससे अलग हो जाता है। इस प्रकार रासायनिक क्रिया प्रक्रिया की सीमा में पाया जाने वाला शरीर एक यंत्र के रूप में चैतन्य इकाई के लिए प्राप्त होता है और विलय होता है। यही जन्म-मरण की प्रक्रिया है।