इस दर्शन ने रासायनिक और भौतिक परिणामकारी सीमा को जड़ प्रकृति की संज्ञा से संबोधित किया है। जड़ प्रकृति विकासपूर्वक ही गठनपूर्णता को प्राप्त होने पर चैतन्य पद को प्राप्त करने की प्रक्रिया को स्पष्टतः प्रतिपादित किया गया है। ऐसी चैतन्य क्रिया आशा, विचार, इच्छा, संकल्प का परिवर्तन एवं परिमार्जनपूर्वक ही अनेकानेक जीव शरीरों के माध्यम से तथा उसकी के आनुषंगिक मनुष्य शरीर के माध्यम से ही उसकी आशा, विचार, इच्छा एवं संकल्प को प्रकट करती है जो वस्तुगत सत्य है। इस वस्तुगत सत्य द्वारा यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य का मूलभूत रूप आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति ही है, जिसे प्रत्येक मनुष्य अपने में ही देखता है।
जड़ शरीर का संचालक चैतन्य क्रिया के होने के ठोस प्रमाण रूप में मध्यस्थ दर्शन प्रस्तुत करता है कि जड़ शरीर जो कुछ भी आहार, वायु आदि के रूप में ग्रहण करता है उसमें से शरीर अपने लिए आवश्यक को आत्मसात कर अनावश्यक को बहिर्गत करता है। इस आत्मसात किए पदार्थ में किसी न किसी रूप अथवा मात्रा में शक्ति है। पाई हुई शक्ति की अपेक्षा में मनुष्य से अत्याधिक अनुपात में शक्तियाँ बहिर्गत होती हैं। जो अधिक मात्रा में शक्ति बहिर्गत होती है वह पूरी चैतन्य क्रिया की ही शक्ति है जो आशा, विचार, इच्छा एवं संकल्प का प्रभाव है, जिसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को भी अनेक प्रकार के साधनों को प्रदान करते हुए देखा जाता है।
प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में यह भी देखता है कि शरीर में जितने भी रासायनिक द्रव्यों का सम्मेलन है वह सब भौतिक रचना एवं यांत्रिकता की क्षमता है। यांत्रिकता क्षरणशीलता से रिक्त मुक्त नहीं है। उनमें से एक भी आशा, विचार, इच्छा एवं संकल्प नहीं प्रकाशित होती। साथ ही यह भी देखा जाता है कि ऐसे शरीर द्वारा ही आशा आदि प्रकट होती है जिसे नकारने की योग्यता विज्ञ पुरुषों में नहीं है। इस संदर्भ में मध्यस्थ दर्शन स्पष्ट करता है कि माध्यम और प्रभाव का संबंध स्पष्ट रहता है- जैसे बिजली और यंत्र का। यंत्रविहीन स्थिति में सापेक्ष शक्तियों का परिचय संभव नहीं हुआ है। इसी तारतम्य में भौतिक शरीर को चैतन्य क्रिया का माध्यम बताया गया है। किसी भी माध्यम में स्वभावगत शक्ति से, अधिक का प्रकटन उससे भिन्न शक्ति का ही होगा। शरीर में जो स्वभावगत शक्तियां हैं वे रासायनिक एवं भौतिक सीमा में सीमित रहने के कारण इनमें आशा आदि के प्रकटन की सम्भावना ही नहीं है। अतः इनके प्रकटन का आधार चैतन्य क्रिया ही हो सकती है।
अतः मध्यस्थ दर्शन ने प्रतिपादित किया है कि आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति चैतन्य क्रिया का स्वत्व है। जब जड़ चैतन्य होता है तब दो मौलिक उपलब्धि की प्राप्ति बताई गई है (1) गठन की पूर्णता होना एवं (2) कम्पन्नात्मक गति का वर्तुलात्मक गति की अपेक्षा में अधिक हो जाना। इन दोनों का एक साथ घटित होना ही चैतन्य हो जाना है। चैतन्य और जड़ दोनों ही क्रियायें है। इस संदर्भ में मध्यस्थ दर्शन का यह भी दावा है कि ह्रास और विकास केवल परमाणु की सीमा में ही पाया जाता है, न कि अणु एवं रचना में इस तथ्य का उद्घाटन मानव जन-जीवन के चिंतन हेतु एक मौलिक कोण प्रदान करता है जिससे जड़ और चैतन्य की निश्चित रेखा स्पष्ट हो जाती है। इस प्रकार मध्यस्थ दर्शन में परमाणु एवं उसमें पाये जाने वाले अंशों की अपेक्षा में सूक्ष्म तत्व को स्पष्ट कर दिया है।
प्रत्येक जीवन में यह देखा जाता है कि विदेशी शक्ति के प्रभाव के बिना किसी में आवेश उत्पन्न नहीं होता। प्रमाणतः पत्थर को जब तक फेंका नहीं जाता उसमें त्वरण का आवेश नहीं पाया जाता। जीवों में भी वैषयिक प्रभाव के बिना आवेश नहीं पाया जाता। मनुष्य शरीर भी विचार के बिना आवेशित नहीं पाया जाता। अतः यह प्रत्यक्ष है कि एक