परमाणु से लेकर बड़ी से बड़ी इकाई तक में अपनी स्वभावगत गति से अधिक गति के लिए विदेशी शक्तियों का आरोपण आवश्यक है परंतु मध्यस्थ दर्शन ने विकास के संदर्भ में यह मूल सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि इकाई की गति ही सापेक्ष शाक्तियाँ है। ऐसी शक्ति का अंतर्नियोजन ही विकास है तथा बहिर्गमन ही ह्रास। यह सिद्धांत इस वस्तुगत रूप में स्पष्ट झलकता है कि हम जितने भी बाह्य अन्य के आश्रित आधार, आधेय, अपेक्षा आदि द्वन्द्वात्मक प्रक्रियाओं में रत होते हैं उतने ही थक जाते हैं। इसके विपरीत में हम देखते हैं कि स्वयं में ही जीने अथवा जीवमूलक क्रियाकलाप का अभ्यास करने पर कभी नहीं थकते। स्वयं द्वारा स्वयं का निरीक्षण करना एवं अनुसरण करना ही अंतर्नियोजन का तात्पर्य है। यही सतर्कता है।
इस तारतम्य में मध्यस्थ दर्शन ने स्पष्ट किया है कि चैतन्य क्रिया में पाई जाने वाली पाँच क्रियायें आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति है। ये पाँचों क्रियायें क्रमशः मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि एवं आत्मा शक्तियाँ है। यही प्रकट होती हैं। इन्ही पाँचों क्रियाओं के सम्मिलित रूप को ही एक चैतन्य परमाणु बताया गया है। चैतन्य परमाणु में स्वयं के निरीक्षण के संदर्भ में बताया गया है कि वृत्ति मन का निरीक्षण करती है तथा मन वृत्ति में समर्पित होता है अर्थात् उसके संकेतों को ग्रहण करने के लिए तत्पर होता है। इसी प्रकार चित्त वृत्ति का निरीक्षण करता है, वृत्ति चित्त में समर्पित होती है, बुद्धि चित्त का निरीक्षण करती है, चित्त बुद्धि में समर्पित होता है एवं आत्मा बुद्धि का दृष्टा है तथा बुद्धि आत्मा में समर्पित होता है। यही पूर्ण विकास है जिसके फलस्वरूप मनुष्य मध्यस्थ जीवन में सम्पन्न होता है।
इसकी अनिवार्यता एवं उपयोगिता को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि व्यवसाय काल में नियम, व्यवहार काल में न्याय, विचार काल में धर्म एवं अनुभव काल में सत्यमयता में प्रकट करने व अनुभव करने योग्य मनुष्य होता है। इस तथ्योद्घाटन से मनुष्य के जीवन में शक्ति के अंतर्नियोजन का तात्पर्य सर्वविदित होता है जो आचरण मानव से चिरकाल से वांछित भी है। इसको सर्वसुलभ बनाने के संदर्भ में ही गठन की पूर्णता, क्रिया की पूर्णता एवं आचरण की पूर्णता को स्पष्ट किया गया है। अंतर्नियोजन प्रक्रिया से प्राप्त नियोजन ही आचरण की पूर्णता है, जबकि क्रिया की पूर्णता मानवीयतापूर्ण जीवन में है, जो अध्ययन से सुलभ होता है । जिसका स्पष्टीकरण अपेक्षाकृत या समग्र की अपेक्षाकृत पद्धति से किया गया है।
मध्यस्थ दर्शन ने परमाणु के मध्य भाग में अवस्थित अंश को आत्मा के नाम से भी इंगित किया है एवं उसकी क्रिया को मध्यस्थ क्रिया बताया है। इसकी साक्षी में यह निरूपित किया है कि उसमें या उस पर सम-विषमात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। इस स्पष्ट निराकरण से हमें यह ज्ञान प्राप्त होता है कि आत्मा सम-विषमात्मक द्वंद्वों से निष्प्रभावी या अलिप्त रहता है। मध्यस्थ क्रिया (आत्मा) की गरिमा को बताते हुए यह भी स्पष्ट किया गया है कि आत्मा के संकेतों को ग्रहण करने योग्य क्षमता, योग्यता एवं पात्रता के निर्माण होने तक सभी आश्रित अंश विकास के लिए बाध्य हैं। पुनः आश्रित अंशों की स्थिति एवं संबंध को स्पष्ट करते हुए मध्यान्श के प्रथम परिवेश में पाये जाने वाले अंशों को बुद्धि, द्वितीय परिवेश में पाये जाने वाले अंशों को चित्त, तृतीय परिवेश में पाए जाने वाले अंशों को वृत्ति तथा चतुर्थ परिवेश में पाये जाने वाले अंशों को मन की संज्ञा से इंगित कराया गया है।
यह उद्घाटन मानव जन जाति के लिए एक देन है जो स्व के संदर्भ में अस्पष्ट अंतराल को स्पष्ट कर देता है तथा स्व-संबंधी वाद विवाद एवं अनेक शंकाओं का समाधान करता है, जो चिरकाल से मानव की वांछा है इसके आधार पर