7. मध्यस्थ दर्शन (क्र. ७) : दर्शन की महत्ता
“दर्शन शब्द संस्कृत मूलक है। इसका व्यावहारिक अर्थ अथवा सार्थकता दृष्टियों के द्वारा देखने के स्वरूप में दर्शन है।” इसकी तात्विक परिभाषा इस प्रकार से है। “दर्शक की दृष्टि के द्वारा दृश्यों के साथ किया गया पहचान+निर्वाह की अभिव्यक्ति+संप्रेषणा।"
व्यावहारिक परिभाषा - “प्रामाणिकता की धारक वाहकता"।
बौद्धिक परिभाषा – “अस्तित्व में अनुभव (जागृति) पर्यन्त विकास क्रम घटना का विश्लेषण”
व्यक्ति में दर्शन - अनुभूतियाँ
- परिवार में दर्शन - मानव संचेतनावादी चरित्र
- समाज में दर्शन - सम्बन्ध एवं मूल्यों का निर्वाह
- व्यवस्था में दर्शन - न्याय व विनिमय सुलभता
- शिक्षा में दर्शन - मानव संचेतनावादी व्यवहार शिक्षा+संस्कार+तकनीकी विज्ञान शिक्षण
- जो स्वयं आवर्तनशील अर्थव्यवस्था मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान, व्यवहारवादी समाज चेतना का व्यवहार + कर्माभ्यास एवं उसकी निरंतरता
शास्त्रों में दर्शन - मानव धर्म संस्कार समाधान एवं उसकी निरंतरता।
- तात्विक दर्शन - मध्यस्थ दर्शन = मध्यस्थ सत्ता + मध्यस्थ क्रिया + मध्यस्थ जीवन की पहचान + निर्वाह
- तार्किक दर्शन – बौद्धिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक अविभाज्य वर्तमान की पहचान + निर्वाह
- व्यावहारिक दर्शन - समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद, अनुभवात्मक अध्यात्मवाद।
- परिभाषायें जब होती हैं तभी उनका ध्यानाकर्षण हो पाता है। दर्शन प्रत्येक मनुष्य में पाई जाने वाली संचेतना में नित्य वर्तमान क्रिया है। जीवन में अर्थात् मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि एवं आत्मा के अविभाज्य वर्तमान में दृष्टियाँ सहज ही वर्ता करती हैं। जीवन का वैभव शरीर के माध्यम से प्रकाशित होने के सत्य को ध्यान में रखते हुए दर्शन की बात को समझा जा सकता है न कि इन्द्रिय सन्निकर्ष की सीमा में। क्योंकि इन्द्रिय सन्निकर्ष में भी जीवन संचेतना का वर्तमान रहना अनिवार्य है। दर्शन क्रिया जीवन की सतत होने वाली क्रिया है। इस क्रम में जीवन संचेतना के स्वरुप में पहचानने और निर्वाह करने की निरंतर गति में प्रत्येक मनुष्य में देखा जाता है। तभी दर्शन की प्रामाणिक स्वरूप सार्वभौम हो जाता है। अर्थात्, जिसे पहचाना गया जिसका निर्वाह होने पर अपने आप में प्रमाण सिद्ध हो जाता है। प्रमाण का स्वरुप प्रयोग व्यवहार और अनुभव में सिद्ध होना ही है। प्रयोग और व्यवहार के मूल में भी अनुभव का वर्तमान होना