ही आचरण से परिपूर्ण चैतन्य इकाई अर्थात् गठन परिपूर्ण चैतन्य परमाणु के गठन में समाए हुए अंशों के 122 आचरणों को इस दर्शन ने स्पष्ट किया है जिनमें आत्मा के दो (2), बुद्धि के चार (4), चित के सोलह (16), वृत्ति के 36, तथा मन के 64 आचरण हैं। भौतिक शास्त्रियों ने भी अनुसंधान पूर्वक परमाणु एवं उसके अंशों के संबंध में जो सूची प्रस्तुत की है अथवा प्रक्रिया को बताया है उसमें भी 122 अंशों अथवा भाग के समाने की संभावना को ही स्वीकारा है। इस प्रकार हमें यह स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि एक गठन पूर्ण परमाणु में 122 अंश या भाग समाए रहते हैं। तथा ऐसा परमाणु चैतन्य होकर रासायनिक द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है परंतु भौतिक शास्त्रियों के अनुसार ऐसा परमाणु तटस्थ एवं निष्प्रभावी (INERT) हो जाता है जबकि मध्यस्थ दर्शन ने ऐसे परमाणु के संदर्भ में क्रिया की पूर्णता को मानवीयता की सीमा में तथा आचरण की पूर्णता को दिव्य मानवीयता की सीमा में स्पष्ट किया है। चिंतनशील जगत के लिए यह एक परम उपलब्धि है, जो प्रत्येक मनुष्य के लिए मानव, देव मानव और दिव्य मानव पद को प्राप्त करने का स्पष्ट एवं सुलभ मार्ग प्रशस्त कर देता है। 

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