अपिरहार्य है इस प्रकार अनुभव और उसके वैभव को ही सामान्य रुप में दर्शन की महत्ता को देख पाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य में दार्शनिक समानता की संभावना है। उसका प्रखर और उज्ज्वल हो जाना ही शिक्षा का ही वैभव है इसका तात्पर्य यह हुआ कि शिक्षा दर्शन-मूलक है और दर्शन अनुभव-मूलक है जिसका प्रयोजन अर्थात् दर्शन का प्रयोजन व्यवहार है। व्यवहार स्वयं शिक्षा व्यवस्था एवं चरित्र का अविभाज्य वर्तमान है। स्त्रोत शिक्षा ही है। 

दर्शन का मूल रूप अनुभव स्वयं प्रामाणिकता और उसकी निरंतरता है वह अपने आप में अभिव्यक्ति एवं सम्प्रेषणा से वैभवित हुआ करता है। सम्प्रेषणा के क्रम में ही व्यवस्था एवं व्यवहार विन्यासित होता है। विन्यसन का तात्पर्य अनुभूतिपूर्ण भाव, भावपूर्ण भंगिमा एवं भंगिमापूर्ण अंगहार से है। मनुष्य जब अनुभवों से ओत-प्रोत होता है तब अपने आप में स्नेह, प्रेम एवं विश्वासपूर्ण भंगिमा स्वभावतः हो पाता है। स्नेह, प्रेम एवं विश्वास ही मनुष्य-मनुष्य के बीच सुखद स्वरूप है। यही व्यावहारिक समाधान प्रतिष्ठा भी है, जब इनकी सम्प्रेषणा होने लगती है अर्थात्, संबंधों में जब उन्हीं भावों का अर्थात् स्नेह-प्रेम एवं विश्वास का अभिव्यन्जित होने की स्थिति में दोनों पक्ष एक सा ओत-प्रोत होते हुए देखने को मिलता है इसी सम्प्रेषणा के क्रम में शरीर के अंग-प्रत्यंगों में होने वाली स्थितियाँ मुद्रा भंगिमा के नाम से ख्यात होती हैं। ऐसी अनेक मुद्राएं मिलकर अंगहार होता है। यही सम्प्रेषण विधि का क्रियान्वयन विन्यास है। इस प्रकार अपनी दृष्टि को अपने में या अपने आस-पास में अर्थात् परिवार, पड़ोस देश-विदेश में जितने भी संबंध एवं संपर्क हैं उसके ओर देखने पूर्वक अर्थात् समझदारी के लिये और समझदारी पूर्वक देखने पर पता चलता है कि एक मनुष्य जैसा अनुभवशील है प्रत्येक मनुष्य वैसा ही अनुभवशील है। 

अनुभव सत्य में, से एवं के लिये होता है। तात्पर्य अनुभूति और सत्य में अविभाज्यता होती है। सत्य स्वयं में अस्तित्व एवं नित्य वर्तमान और वैभव है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अस्तित्व में अनुभूत होना ही सत्य में अनुभूति का अर्थ हुआ। अस्तित्व जिसका नहीं है जो नहीं है अथवा जैसा नहीं है वह सब भास आभास और प्रतीति हो सकता है। अनुभव नहीं हो सकता। अनुभव अस्तित्व के अतिरिक्त और कहीं नहीं होती न ही होने की व्यवस्था है। यही सत्यता विकास के क्रम में भी देखने को मिलता है कि अस्तित्व में अनुभव होने पर्यन्त विकास का क्रम नित्य प्रसवशील एवं प्रभावशील है। अस्तित्व के अतिरिक्त जो भी भास आभास होता है वह सामयिक रुप में होना पाया जाता है जैसे रस्सी सर्प जैसा भासना जब उसका परीक्षण निरीक्षण होने पर वैसा न होना। जैसा मृगतृष्णा मरीचिका, तपे हुए बालू के मैदान में पानी अथवा समुद्र का भास आभास होने मात्र से परीक्षण निरीक्षण पूर्वक उसकी भास्यता दूर हो जाती है। इसी प्रकार कितने भी भ्रमवादी घटनायें हो जाती हैं वे सब भास आभास होते हुए उसकी सत्यता अनुभव की कसौटी पर यथार्थता तक पहुंच नहीं पाता क्योंकि उसका अस्तित्व ही नहीं रहता| इस प्रकार से हम यह सूत्र पाते हैं की जिसका अस्तित्व नहीं है उसका अनुभव नहीं होता। साथ ही अस्तित्व में ही अनुभव होता है। 

“अस्तित्व न घटता न बढ़ता।” इसलिये अस्तित्व में अनुभूति अधिक और कम उपाधिग्रस्त नहीं होती। इसी कारणवश अनुभव पूर्ण होता है और पूर्णता की निरंतरता होती है। यही मानव संचेतनावादी शिक्षा संस्कार का स्रोत है एवं गम्यस्थली भी है इससे असंदिग्ध रूप में हमें पता चलता है कि शिक्षा की महत्ता, पूर्णता एवं उसकी निरंतरता के अर्थ में है जो स्वयं अनुभवों का सत्यापन और उसकी सम्प्रेषणा है। सत्यापन की स्थिति में अनुभव दर्शन के नाम से विख्यात होता है जब उसकी सम्प्रेषणा होती है अर्थात् जब दूसरों को समझा पाते हैं तब वह पाठ रूप हो जाता है। ऐसा पाठ रूप विशेषकर वाङ्मय के रूप में मिलता है। वाङ्मय स्वयं भाषा में ख्यात होता है। भाषा विज्ञान से अनुशासित होने और

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